Saturday, 7 November 2020

आकाश

 आकाश


(1)◆

दूर तक फैला राख का समंदर

आकाश किसी धूणी रमाये अघोरी सा

खड़ा है एक टांग पर

बरसों से...!


(2)◆◆

इन दिनों 

हैरान है आकाश

अपने साँवले अधरों पर/

जैसे पीता हो 

दिन की तीस सिगरेट

सब कुछ धुआँ करने को..!


(3)◆◆◆

आकाश के दामन में हैं

ढेरों पुलिंदे 

शिकायतों के..

कोई धुँधला परदा है बीच में कि

नहीं पहुंचती कोई प्रार्थना ठीक से/

आकाश किससे कहे

उसका दम घुटता है..!!


(4)◆◆◆◆

धुआँ चाहे बारूद का हो या

हो निजी स्वार्थों का..

आकाश झेलता है/

वो जमकर बरसता है

हालातों पर..

उसे भी जिद है

रोज नया सूरज उगाने की..!


(5)◆◆◆◆◆

जब छूटने लगती है

हाथों से डोर/

आकाश सिमट कर

आ जाता है

मन के आँगन में

किसी नीली पतंग सा

हौले हौले..!


(6)◆◆◆◆◆◆

बालकनी भर दुनिया में

आकाश की उपस्थिति

जैसे होना किसी मित्र का

स्थाई रूप से/

मन की टेबल पर

मूक संवाद और

एक निस्सीम भाव

चाय के प्याले में उतरते जाना

किसी हमख़याल सा..!


(7)◆◆◆◆◆◆◆

उसे पता है

शून्य होकर भी

हुआ जा सकता है

निस्सीम..!


(8)◆◆◆◆◆◆◆◆

वो उसकी एक मुस्कान पर

बिछा देता है

खुद को/

जमीं हँसती है

आकाश सजदा करता है..!

क्षितिज पर रचती है

कत्थई मेहंदी..!


-अल्पना नागर



Sunday, 1 November 2020

लौट आना

 लौट आना


जाने से पहले

लौट आना 

जैसे लौटती है कविता

कवि के पास

दुनियाभर की घुमक्कड़ी के बाद


वैसे ही जैसे लौटती है

हर जाती हुई सांस

जिस्म के पिंजरे में हर बार

उड़ती हुई राख पे खिलते फूलों से होकर

नदियों की शिराओं तक/

शिराओं में प्रवाहित होते जीवन से लेकर

पुनः राख बन बहने तक

लौट आना..


जाने से पहले 

देखना एक बार मुड़कर

पहली बार स्कूल जाते बच्चे की तरह

कि लौटना हर बार/

बाहों में आकाश लिए

परिंदे की तरह उड़ान भरे


जाने से पहले 

सौंपते जाना अपना सर्वस्व

जैसे सौंप के जाता है दिन

अपनी उमंगे और ऊर्जा

रात की संदूकची को

चाँद तारों से भरकर..

पुनः पुनः लौट आने को !


-अल्पना नागर




कहानी- वेदना

 कहानी

वेदना


"बेटा, एक बार बात तो कर लो।मैं कब से फोन किये जा रही हूँ, सिर्फ एक बार इस अभागिन की बात सुन लो ! फिर चाहे जो सजा देनी हो,दे देना।" फोन के दूसरी ओर एक काँपते पत्ते सी आवाज फड़फड़ा रही थी।

"आपसे कितनी बार कहा है..यहाँ फोन मत किया करो।कितने नम्बर ब्लॉक करूँ,हर बार पता नहीं कहाँ कहाँ से फोन करती रहती हो!"खट्ट से फोन कटने की आवाज आयी।

उंगली का नाखून जब कटकर गिरता है तो दर्द नहीं होता,वो स्वेच्छा से काटा जाता है।सभ्य समाज में रहना है तो नाखून कटे होना पहली शर्त है।एक प्राकृतिक क्रिया बिना किसी दर्द या वेदना के।अपने बच्चों को अलग करना भी कुछ ऐसा ही है।दूर किसी अच्छी जगह अध्ययन के लिए अपनी संतान को भेजना सभ्यता की ओर पहला कदम..समाज की दृष्टि में!

लेकिन नाखून अगर स्वेच्छा से ही जड़ से निकाल कर अलग कर दिया जाए तो..उफ्फ कल्पना मात्र से ही पूरे शरीर में एक झुरझुरी दौड़ पड़ी..है न!असहनीय वेदना !

हाँ.. मैनें अपने ही हाथों अपनी उंगलियों के नाखून नोच डाले।अब आप सोच रहे होंगे कि भला कोई अपने आप से ऐसा क्यों करेगा!इस तरह की यातना स्वयं को क्यों देगा!

आज से बीस वर्ष पूर्व मेरी गोद में वो आयी।रुई के गोले सी सफेद झक्क मुलायम मेरी बच्ची..देखते ही मैं अपनी सारी प्रसव वेदना भूल बैठी।बस मातृत्व की धारा पूरे बदन में हिलोरें मार रही थी।मैं सोते जागते हर वक्त बस उसे निहारती रहती।रात सोते वक्त उसका मासूम चेहरा दैवीय जान पड़ता था,मैं हर क्षण सतर्क रहती कहीं मेरी वजह से नन्हीं जान को कोई तकलीफ न हो।उसे जन्म देकर मैं पूर्ण हो गई थी।एक नया जन्म..स्वयं मेरा !

"ये इतनी प्यारी है..इसे तो मैं ही रखूँगी अपने पास..।"हसरत से निहारती दीदी नें गोद में उसे दुलारते हुए कहा।

"अरे दीदी..मेरे कलेजे का टुकड़ा है ये..इसे तो मैं नहीं दूँगी।मेरे पास ही रहेगी मेरी राजकुमारी।" बात को गंभीरता से लेते हुए मैनें कहा।

दीदी पंद्रह वर्ष के विवाह पश्चात भी निःसंतान के दंश को झेल रही थी।मैं उनकी भावना समझ रही थी लेकिन मेरी भावना का क्या..! एक नई नवेली माँ को उसका पहला बच्चा कितना प्यारा होता है ये बताने की जरूरत नहीं।एक माँ अपने ही अंदर के एक टुकड़े को नया जीवन देती है।वो टुकड़े के जरिये स्वयं का विस्तार कर रही होती है।और संतान अगर लड़की है तो एक माँ हमेशा के लिए 'जीवित' हो जाती है।उसकी आदतें,गुण,संवेदनशीलता और स्त्रीत्व सब उसमें स्थानांतरित हो जाते हैं।एक माँ के लिए इससे बढ़कर सुकून और क्या हो सकता है।सच कहूँ तो मैं उस वक्त बहुत ज्यादा स्वार्थी हो गई थी।मैनें ये भी नहीं देखा कि दीदी का खिला हुआ चेहरा मेरे जरा से वक्तव्य से कितना आहत हुआ..एकदम से मुरझा गई थी वो।पर मैं क्या करती मुझ पर उस वक्त एक माँ हावी थी जिसके लिए उसकी संतान ही सब कुछ थी।

वक्त नें शायद मेरी बेरुखी को पहचानकर मुझे जोरदार चांटा जड़ा।उसे मंजूर ही नहीं था कि मैं मातृत्व के उस अलौकिक सुख को ज्यादा देर अनुभूत कर सकूं।उसे देख देखकर दिन जैसे पंख लगाकर उड़ रहे थे।वो मुश्किल से साल भर की हुई कि एक खबर नें मुझे हिला कर रख दिया।काली खांसी का दौरा मेरे जीवन को किस कदर काला स्याह कर देगा मैनें सोचा तक न था।दिन रात मेरे कलेजे से उठती असहनीय वेदना और निरन्तर खांसी के दौरे नें घर की नींव हिला दी।बहुत तरह के वैद्य हक़ीम और डॉक्टर से परामर्श लिया किन्तु कोई फायदा नहीं..खांसी जैसे मेरे अंतस में डेरा डाल के बैठ गई।वो जैसे कीमत मांग रही थी अपनी सबसे बेशकीमती चीज़ से खुद को जुदा करने की!मैं किसी दीमक लगे विशाल पेड़ की तरह किसी भी क्षण गिरने वाली अवस्था में स्वयं को महसूस कर रही थी।मेरे सपने में अक्सर एक काला साया उठता हुआ दिखता वो जब भी आता मेरी फूल सी कोमल बच्ची को अपनी मजबूत भुजाओं में उठाकर धुआँ बन अदृश्य हो जाता, सुबह उठकर मैं पसीने पसीने हो उठती।पास लेटी बच्ची को सुकून से सोया देखकर भी मन में उस काले साये की दस्तक सुनाई देती थी।

काली खांसी का उस वक्त कोई पुख्ता इलाज न था।मुझे संक्रमण की चिंता सताने लगी।मुझे काला साया अब मेरे बेहद नजदीक बैठा दिखाई देने लगा।मुझे लगा मैं शायद अपना दिमागी संतुलन खोने लगी हूँ।मैं हवा में ही अदृश्य रूप से उस हावी होते साये पर अपने हाथ पांव मारने लगती।मेरा परिवार ये सब देखकर सकते में आ जाता।कोई भी अगर मेरी स्थिति देखता तो शायद यही प्रतिक्रिया देता।

बिगड़े दिमागी संतुलन में भी मुझे ख़याल आया कि मुझे अपनी बच्ची की उस काले साये से हिफाजत करनी है किसी भी हाल में।मैं अपने आप से लड़ रही थी,समय की सख्त नुकीली सुइयां जो भाला बनकर मेरी बच्ची की ओर निशाना साधे थी,मैं स्वयं को उनके आगे देख पा रही थी।सुइयों की चुभन मुझे इतना परेशान नहीं करती थी जितना ये ख़याल कि मेरे न होने पर यही नश्तर मेरी बच्ची को चुभे तो !

आनन फानन में मैं एक फैसला ले चुकी थी।एक बहुत बड़ा पत्थर मुझे अपने कलेजे पर महसूस हो रहा था।टेलीफोन पर नम्बर डायल करते मेरे हाथ बुरी तरह काँप रहे थे।

"दीदी आप प्लीज जल्दी आ जाओ..।"

बोलते हुए मेरे शब्द मुझसे ही टकरा रहे थे।

दीदी के हाथों में मेरी बच्ची खिलखिलाते किसी झरने सी दिखाई दे रही थी।मुझे संतुष्टि थी कि मेरा फैसला गलत हाथों में नहीं है।मैं अपनी जान उसे सुपुर्द करने वाली थी जो इसकी हिफाज़त जान से भी बढ़कर करना जानती हो।दीदी पर मुझे भरोसा था।

मैं अपनी बच्ची को दूर ले जाते हुए देख रही थी।जाते हुए दीदी की पीठ पर चिपकी उसकी मासूम आँखें आज भी मेरा पीछा करती हैं।उन मासूम आँखों में भरे तात्कालिक आँसू स्थानांतरित होकर मेरी आँखों में हमेशा के लिए ठहर गए।दीदी नें उसका पालन पोषण बहुत अच्छे से किया।वो नाजों से पली बढ़ी।मेरी गोद भरकर भी सूनी ही रही,ये कैसी नियति थी!

क्रूर वक्त नें करवट ली।मेरे असाध्य रोग नें जैसे कीमत चुकता होते ही अपनी जकड़ ढीली कर दी।वो काला साया सचमुच मेरी बच्ची को हमेशा के लिए लेकर चला गया।समय के साथ मैं स्वस्थ होती गई।बच्ची परिपक्व सुंदर युवती में तब्दील हो गई।उसे पुनः पाने के समस्त प्रयास वैसे ही विफल हो गए थे जैसे आत्मा गिरवी रखने के बाद बचा हुआ शरीर! 

बीस वर्ष पूर्व जिस स्वार्थमयी माँ का किरदार मैं निभा रही थी उसी किरदार में आज दीदी को देख रही थी।उन्होंने बेटी को हमेशा हमेशा के लिए पाने के लिए मेरे विषय में जो कुछ भी कहा उससे उन दोनों के बीच का संबंध तो प्रगाढ़ हुआ किन्तु मेरे और बिटिया के बीच गहरी खाई जितनी दूरियां पैदा हो गई जहाँ से दूर रहकर किनारे से लाख आवाज दो किसी प्रत्युत्तर की कोई संभावना न थी,खाई को पारकर नजदीक जाना तो बहुत दूर की बात थी।उसे कहा गया कि मैनें उसे बेटे की चाहत में जानबूझ कर त्याग दिया।दीदी की आँखों में झाँककर देखा,उनमें 'पश्चाताप' की भावना के साथ एक असहाय माँ भी झलक रही थी।सच है जन्म के एक वर्ष बाद से ही वो उसपर अपना सर्वस्व वारकर जी जान से उसका ख़याल रख रही थी।सही मायनों में वही उसकी 'यशोदा' माँ थी।किन्तु जिसे जन्म दिया उसकी आँखों में मेरे लिए नफरत के अंगार नहीं देख पा रही थी।लग रहा था कि एक दिन ये उपेक्षित अंगारे मुझे भस्म कर देंगे।मेरी आत्मा को रोज उनमें स्वाहा होते देखना कितना दुष्कर कार्य था ये बात शायद मेरे अलावा कोई नहीं समझ सकता।

मुझे आज भी याद है वो दिन जब दीदी नें एक कार्यक्रम का आयोजन किया था,मुझे बेमन से ही सही उसमें उपस्थित होने के लिए औपचारिक निमंत्रण दिया था।मैं बेटी की एक झलक देखने की ललक में किसी अदृश्य डोर के सहारे खींची चली आयी।मुझे देखकर दीदी के चेहरे पर उड़ती हवाइयां उनके अंदरूनी हाल बयां कर रहे थे।खैर मुझे उनसे कोई गिला नहीं था।मेरी नजरें उसी मासूम पौधे को ढूंढ रही थी,जो मेरे अंदर हर रोज पनप रहा था,जिसे अपने आत्मीय वात्सल्य के जल से मैनें हर रोज सिंचित किया था,उसकी सलामती और खैर की दुआएं पढ़ी थी।लेकिन मैं इतना भी जानती थी कि पौधा अब खूबसूरत वृक्ष में तब्दील हो चुका होगा,जिसे सिर्फ देखभाल करने वाले दृश्यमान माली की ही परवाह होगी न कि प्रार्थना से सींचने वाले अदृश्य जल की!

अपने बीसवें जन्मदिन पर वो जब तैयार होकर सबके सामने आयी, किसी स्वप्निल राजकुमारी सी लग रही थी,सब अपलक बस उसे निहारते रह गए।वो हूबहू अपने पिता की तरह तेजस्विनी थी।मैं मेहमानों की भीड़ में पीछे से उसे निहार रही थी।ईश्वर का शुक्रिया अदा कर रही थी कि इस दिन से मुझे नवाजा।मेरी बेटी को कुशल हाथों नें संवारा।

सहसा उसकी निगाह मुझपर पड़ी।वो शायद किसी पुरानी तस्वीर से मुझे पहचान गई थी।अपना खून था,कैसे नहीं पहचानता!मेहमानों की भीड़ को चीरते हुए वो मेरे पास पहुँची।उसके और मेरे बीच की दूरी तय होने तक न जाने कितने जन्मदिन जो मैंने उसकी अनुपस्थिति में अकेले मनाए,किसी फ्लैशबैक की तरह एक एक कर मेरी नजरों के सामने आये।मैनें अपने हाथ फैला लिए ताकि उसे गले लगा सकूँ।वो अब मेरे ठीक सामने थी किसी प्रतिबिम्ब की तरह।भावनाओं के उमड़ते वेग को मैनें किसी तरह अपनी आँखों की देहरी पर रोका।उसकी नजरों में मेरे लिए नफरत का समंदर तैर रहा था,मेरी फैली हुई बाहें पुनः अपनी हद में आकर सिमट गई।बहुत देर तक हम दोनों के बीच मूक वार्तालाप हुआ।वो बहुत से प्रश्नों का ढेर मुझपर उड़ेल देना चाहती थी लेकिन सजा के तौर पर उसने चुना चुप्पी जो मुझे नश्तर की तरह हर जगह चुभने लगी।

"बेटी.."।मेरे मुँह से उस वक्त सिर्फ इतना ही निकल पाया।

"मैं नहीं हूँ आपकी बेटी..नफरत है मुझे आपसे..! बहुत बहुत नफरत..क्यों आयी हैं आप आज यहाँ..!"आक्रोश का ज्वालामुखी यकायक उसके अंदर से फूट पड़ा।उसकी सुर्ख आँखें बहुत कुछ बयां कर रही थी।

मेरी आँखों में रुकी हुई निर्झरिणी बह निकली।उसे देने के नाम पर दुआ से भरा हाथ उसके सर पर फेरती इससे पहले ही भीड़ को चीरते हुए वो मेरी नजरों से ओझल हो गई।एक काला साया उसकी परछाई बन दूर से मुझे दिखाई दे रहा था।वातावरण में अजीब सा अट्टहास सुनाई दिया।मेरी सभी इंद्रियां मुझे हेय दृष्टि से देख रही थी।मेरी आँखों पर छाई नम धुंध मिटने का नाम नहीं ले रही थी।मैं उसे और ज्यादा दुःखी नहीं देख सकती थी।अपने कलेजे के टुकड़े से कभी न मिलने के खुद से किये वादे के साथ मैं भरे मन से लौट आयी।

मुझे अपने नाखूनों में असहनीय वेदना महसूस हो रही थी।


-अल्पना नागर


Saturday, 31 October 2020

चाँद की बातें

 चाँद की बातें


धूल धक्कड़ और धुंध के इस दौर में

जबकि आधी दुनिया

लपेट कर घूम रही है

बेरुखी का आवरण/

तुम उतर आये जमीन पर

किसी नाविक की तरह

धुंध की नदी को चीरते हुए

चांदनी की खीर हाथों में लिए

फीके मन को मीठा करने..!

कल शरद पूर्णिमा थी

मेरी जुबां पर ठहर गई है

वही तुम्हारी

मद्धिम मिठास !


कल देखा 

आसमां में आधे थे तुम

आधे बह रहे थे जमीन पर !

तुम्हारी दूधिया झिलमिल रोशनी में

प्रेम की लहरें कर रही थी नर्तन

कितना अलौकिक !

तुम हर तरफ से झाँक रहे थे

खिड़कियों से..पत्तों की ओट से,

बंद दरवाजे की दरारों से/

हर चेहरे पर खिला था बस

तुम्हारा प्रतिबिम्ब !


कमाल है मगर !

तुम्हारे मद्धिम प्रकाश में

सुनाई दे रही थी

मृत त्वचा के नीचे सांस लेती

नीली नसों की जिंदा धड़कनें/


मन की सीली सीढ़ियों पर 

गीले पाँव

चढ़ते उतरते तुम

रात की अंधेरी बावड़ी में

देर तक पैर लटकाए

मना रहे थे

अपने होने का उत्सव/


ये सच है

बेइंतहा रोशनी लेकर आती है

चौंधियाता अँधेरा !

भयंकर रोशनी के इस दौर में मगर

मुझे तलब होती है

बित्ति भर रोशनी की

बस उतनी ही

चांदनी जितनी..!


-अल्पना नागर




Monday, 19 October 2020

प्रवासी यात्रा

 *प्रवासी यात्रा*

*विधा- छंदमुक्त*


प्रवासी यात्रा


आसान न था इस बार

पुनः स्थापित होना

चैत्र से अब तक की दूरी

अनंत मीलों को समेटे हुए थी/

शीशे की दीवारों से झाँकते 

तुम सुरक्षित लोग

मुझे देख रहे थे 

स्वयं को विसर्जित होते..


एक नदी उमड़ी थी

आँखों के कोर से

मन के तटबंधों को तोड़

मुझे समूचा समाहित करने को/

तुम्हारे चारों ओर

सुरक्षा के ठोस इंतज़ामात के बाद

मुझे डूबना था !

और यक़ीनन मैं डूब गई

असुरक्षा के अथाह समंदर में/

अनेकानेक अदृश्य हाथों नें

धकेला था मुझे..!


एक बार पुनः मेरे समक्ष हैं

करबद्ध समूह और

सजी हुई चौकी..

मन खिन्न है/

आपादमस्तक उद्विग्न है

पर..माँ हूँ न !

ठोस अस्तित्व और

संतति के भार को

कछुए की तरह

ढोती आयी हूँ/

हर बार दौड़ी चली आयी हूँ,


बस एक निवेदन है

इस बार मत देखना मेरे तलवे

कंजक भोज के समय/

कि महावर की जगह

रक्त बहता दिखेगा !

मत ओढ़ाना मुझे

गोटे लगी लाल चुनरी/

कि मेरी झुलसी आत्मा को

ये ढक नहीं पाएगी..


मुझे भय है

तलवों पर चिपकी

दुत्कार की पिघली डामर

और सदी जितने प्रवासी ज़ख्म

तुम्हारे हाथ मैले कर देंगे

इतने मैले कि

नहीं ठीक कर पायेगा

मंहगे से महंगा 

सेनेटाइजर भी..

-अल्पना नागर

Friday, 16 October 2020

थका हुआ दिन

 थका हुआ दिन


थका हुआ दिन 

आँखें मूंदे

पीठ करके बैठा है

पश्चिम की नौका पर

किसी अंजान नाविक के भरोसे/

पनीला आसमान 

छिड़कता है चंद बूँदें

शरारत की

दिन के क्लांत चेहरे पर/


उनींदा दिन मुस्कुराता है

और घुलने लगता है

पनीले आसमान में सिंदूरी रंग

दिन के कपोल से छूटकर..

थोड़ी और फैल जाती है

सूरज की बिंदी 

आसमान के शुभ्र ललाट पर/


ये जानते हुए भी कि

पश्चिम की नौका

डूबा देगी उसे अंततः

किसी अंधेर गुफा में/

वो चुनता है भरोसा 

उसी अदृश्य नाविक पर!


अंधेर गुफा

जहाँ एक एक कर इक्कट्ठे होते हैं

अधूरी इच्छाओं के टूटते तारे

प्रार्थनाओं के जुगनू

आस्थाएं और

चमकीले शब्द/

गुफा की छत पर

उल्टे टंगे होते हैं

किसी चमगादड़ की तरह


इस सबके बावजूद

थका हुआ दिन

जारी रखता है अपनी

एकांत यात्रा/

वो तोड़ता है गुफा से चिपके 

टूटे हुए तारे..

प्रार्थनाएं..

आस्थाएं..

एक एक कर भरता है

अपनी नौका में/

न जाने क्यों 

ठीक उसी वक्त बेनूर नौका

जगमगा उठती है..

निशा के अंतिम छोर पर

बिखरा होता है

दूधिया उजाला/


थका हुआ दिन 

अब नहीं है थका हुआ

वो लगाता है डुबकी 

समर्पण की झील में..

अर्घ्य देता है

नए जीवन को

हर सुबह/

वो दोहराता है

यही क्रम हर रोज

पश्चिम की नौका के

ठीक सामने..!


-अल्पना नागर






कहानी

 


कहानी

मम्मी कहीं चली गई


"पापा..मम्मी कहीं चली गई है..!"एक हड़बड़ाई मासूम आवाज नें समूचे स्टाफ का ध्यान आकर्षित किया।

पांच साल की मंटू की गोल मटोल आँखों में बूँदी के लड्डू जितने बड़े आँसू थे।

सभी हैरान परेशान अध्यापकगण मंटू के अध्यापक पिता की तरफ देखने लगे।अब बारी उन्हीं के बोलने की थी।

"क्या..मम्मी चली गई?कहाँ गई होगी,वहीं होगी घर पे ही..ठीक से देखा तुमने?अध्यापक पिता नें मंटू से पूछा।

"नहीं..सब मेरी ही गलती है।मैं खाना नहीं खाती न ठीक से इसीलिये गुस्सा होकर चली गई।मम्मी नें बोला भी था कि ऐसे ही परेशान करती रही तो एक दिन सबको छोड़ के चली जाऊंगी।"इतना कहकर मंटू दहाड़े मार मारकर रोने लगी।

स्टाफरूम में ठहाके गूंजने लगे।बेचारे अध्यापक पिता का चेहरा देखने लायक था।वो तुरन्त मंटू से बोले,"चलो बाहर,मम्मी को ढूंढने चलते हैं।"

पास की दुकान से मंटू की फेवरेट रंग बिरंगी पॉपिंस खरीदी गई।मंटू का ध्यान अब मम्मी से हटकर दुकान की चीजों पर जा चुका था।स्कूल बैग में ढेर सारी टॉफी चॉकलेट आ चुकी थी।मंटू खुश।अब मम्मी के गुम हो जाने का खास अफसोस नहीं रहा।

अध्यापक पिता सीधे अपने करीबी मित्र के घर पहुँचे।वो जानते थे मंटू की मम्मी वहीं मिलेगी।वहाँ पहुंचकर देखा मंटू की मम्मी के हाथ में बड़ा सा पुदीने के ज्यूस का गिलास था और करीबी मित्र की पत्नी के साथ गप्पे शप्पें हो रही थी।मंटू और उसके पिता को एकसाथ देख दोनों को थोड़ी हैरानी हुई।गप्पें बीच में ही कहीं अधूरी जो लटक गई थी।

"अरे आप..! अचानक..क्या हुआ सब ठीक है?"मंटू की मम्मी की आँखें विस्मय से थोड़ी और बड़ी हो गई थी।

"पूछो अपनी लाडो से..मैडम साहिबा सीधे स्कूल पहुँच गई वो भी स्टाफरूम में..पहुंचते ही क्या गजब का गॉसिप टॉपिक छोड़ के आयी है..अब देखना कितने दिन तक वो लोग मुझे अपनी किस्सागोई का हिस्सा बनाएंगे..'मम्मी कहीं चली गई पापा'..!!"अध्यापक पिता एक ही सांस में सब बोल गए।

मंटू की 'गुम' हुई मम्मी और उसकी सहेली पेट पकड़ कर हँसने लगी।अध्यापक पिता का गुस्सा सातवें आसमान पर।

"पर ये आज इतने जल्दी कैसे आ गई।अभी तो इंटरवेल भी नहीं हुआ होगा!"मंटू की मम्मी नें कलाई घड़ी देखते हुए पूछा।

दोनों माता पिता मंटू को घूरने लगे।

मंटू अचकचाकर बोली,"पापा वो आज जल्दी छुट्टी हो गई।"

"जल्दी छुट्टी..यूँ अचानक ही..कोई जयंती या खास दिन भी नहीं..!"दिमाग पर जोर डालते हुए अध्यापक पिता नें कहा।

"अजी अब छोड़िए भी..चलिए घर चलते हैं।मंटू को भूख लगी होगी।"मंटू की मम्मी नें एलान किया।पुदीने का ज्यूस आधा छूटा रह गया साथ ही गॉसिप भी।

बमुश्किल मंटू का ये पांचवा दिन था स्कूल में।पांच दिनों में क्या क्या हुआ देखते हैं..

मंटू को स्कूल भेजने के लिए राजी करना आसान न था।अध्यापक पिता नें कई दिन पहले ही उसे मनाने की तैयारियां शुरू कर दी थी।या यूँ कहिए छोटी मोटी रिश्वत मंटू मैडम को रिझाने के लिए।

मंटू नें कहा जूते चाहिए तभी स्कूल जाएगी।

शहर की सबसे अच्छी जूतों की दुकान पर उसे ले जाया गया।

रैक में रखी सभी जूतों की जोड़ी का सिंहावलोकन करने के बाद मंटू की नजर एक जोड़ी जूते पर ठहर गई।बहुत ही खूबसूरत जूते थे किसी प्रसिद्ध ब्रांड के।जूतों पर उसके फेवरेट मिनी और मिकी माउस बने हुए थे।यक़ीनन जूते शानदार थे मगर ये पूरा अंदेशा था कि दाम भी बहुत शानदार होंगे!

अध्यापक पिता की अनुभवी आँखों में खौफ के बादल तैरने लगे।सर्दी में भी माथे पर पसीने की बूँदें झलक आयी।ये उन दिनों की बात है जब अध्यापकों की तनख्वाह चार अंकों तक ही सीमित थी।और गली मोहल्ले में अध्यापक मक्खीचूस नाम से ज्यादा जाने जाते थे।खैर इतने कम वेतन में कंजूस बन जाना स्वाभाविक था।

"बेटा ये देखो..कैनवास के कितने प्यारे जूते,कितना चटख लाल रंग है..हरे फीते..वाह इससे बेहतरीन जूते कहीं नहीं होंगे।"अध्यापक पिता मंटू की नजर मिकी और मिनी वाले जूतों से हटाने का भरसक प्रयास कर रहे थे।

लेकिन मंटू को जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था।जिन जूतों पर उसकी निगाह अटकी पड़ी थी उसमें बने मिनी और मिकी चीख चीखकर मंटू से कह रहे थे,"प्लीज हमें घर ले चलो..तुम्हे दुनियाभर की सैर कराएंगे।"

मंटू नें एलान कर दिया।जूता अगर चाहिए तो बस यही वरना कोई नहीं..वो सीधे दुकान की जमीन पर धरना डाल के बैठ गई।

अध्यापक पिता की जुबान पे ताला लग गया था पर फिर भी पूछना तो था ही।दबी जुबान से जूते के दाम पूछे।

"सौ रुपया मात्र!" मौके की नजाकत पर चौका मारते दुकानदार नें कहा।

"क्या !!! सौ रुपया..? इतने में तो कई जोड़ी जूते आ जाएंगे।बच्ची ही तो है।सही सही लगाओ दाम।"माथे से पसीना पोंछते अध्यापक पिता नें कहा।

हाँ,तो दूसरा पीस ले लो न..!ये लीजिए कैनवास के बढ़िया जूते मात्र चालीस रुपया।"

अध्यापक पिता कातर निगाहों से मंटू को देखने लगे कि अब कर्ता धर्ता यही है।

लेकिन मंटू तो भई मंटू है..एक बार कोई चीज पसंद आ गई तो अंगद के पांव की तरह इंच मात्र भी नहीं हिलती।

"पूरी अपनी माँ पे गई है.."।मन ही मन बड़बड़ाते हुए अध्यापक पिता नें कहा।

"ठीक है वही दे दो जो बिटिया को पसंद आ रहे हैं।"

मंटू खुश।मिनी और मिकी उससे भी ज्यादा खुश।

"और कुछ?" अध्यापक पिता नें ठंडी सांस भरते हुए पूछा।

"एक घड़ी भी.."

"क्या!!..तुझे टाइम देखना तक ठीक से नहीं आता।घड़ी का क्या करेगी।"

"पापा.. आप स्कूल जाते हो तब घड़ी पहनते हो न..?"

"हाँ.. पर मेरी बात अलग है।"

"क्यों अलग है..मैं भी तो स्कूल जाऊंगी न कल से..सोच लो स्कूल भेजना है कि नहीं..!"कनखियों से देखते हुए मंटू नें अपनी बात रखी।

खैर,दोनों घर आ गए।मंटू की नन्ही कलाई में चमकीली रंग बिरंगी प्यारी सी घड़ी थी।और अध्यापक पिता के मुँह की घड़ी बारह बजा रही थी।

मंटू के स्कूल का पहला दिन।

मंटू से कोई बात नहीं कर रहा।मंटू भी किसी से बात नहीं कर रही।

"बड़ा ही बेकार होता है ये स्कूल विस्कुल..कमरे में बिठा दिया एक जगह।उठ के खड़े हो जाओ तो टीचर की डांट सुनो।ये भी कोई बात हुई।सब मेरी घड़ी की ओर ही देखे जा रहे हैं।चोरी हो गई तो..मम्मी नें बोला था संभाल के रखना।बैग में रख लेती हूँ अंदर बंद करके।फिर कोई नहीं ले पायेगा।"

घर पहुंचकर सब मंटू से पूछे जा रहे थे।घड़ी कहाँ रखी थी।किसने ली..वगैरह वगैरह।मंटू चुपचाप सुने जा रही थी।उसे याद नहीं उसने घड़ी निकाल कर बैग में रखी या ज्योमेट्री में।कहीं नहीं मिल रही थी।

मंटू को स्कूल बेकार लगा।

दूसरे दिन मंटू नें घर आकर अपने अध्यापक पिता को प्रवचन सुना दिया।वही प्रवचन जो वो अपने टीचर से सुनकर आयी थी।

अध्यापक पिता युवा थे।नया नया सिगरेट शुरू करने का सोचा ही था।अलमारी में दो सिगरेट रखी थी जो मंटू की खुफिया नजर से बच नहीं सकी।फौरन पापा को प्रवचन दे डाला।"पापा हमारी टीचर कहती है,सिगरेट पीना बुरी बात होती है,जिनके पापा सिगरेट पीते हैं वो गंदे होते हैं।और आप तो मेरे अच्छे पापा हो न..!"

इमोशनल प्रवचन से अध्यापक पिता द्रवित हो गए।अपनी गलती का एहसास हुआ।मंटू के सामने ही सिगरेट तोड़ के फेंक दी।और कभी न पीने का प्रॉमिस भी दिया।

पता नहीं क्यों उस दिन अध्यापक पिता को मंटू पर बहुत स्नेह आया।

तीसरा दिन।

मंटू स्कूल की सीढ़ियों पर धूप में काफी देर खड़ी रही।ये सोचकर कि कोई तो अंदर आने को बोलेगा मंटू को पर किसी नें नहीं बोला।सब ऐसे गुजर रहे थे आसपास से जैसे कि मंटू दिखाई ही नहीं दे रही थी।किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था।मंटू के पांव धूप में चमक रहे थे अब उनमें जलन होनी शुरू हो गई।हारकर मंटू को खुद ही अंदर जाना पड़ा।

चौथा दिन।

मंटू को एक दोस्त मिल ही गई आख़िरकार।हुआ यूं कि नई दोस्त के पास कुछ ऐसा था कि मंटू खुद को रोक न पाई।उसने अपना 'ईगो' तोड़कर खुद से चलकर नई दोस्त से बात की।दोस्ती का प्रस्ताव भी रखा।

अब वो आयी मुद्दे पर।

मंटू की नई दोस्त के पास एक बहुत ही आकर्षक पेंसिल थी जिसके पीछे वाले हिस्से पर एक छोटा सा चेहरा बना हुआ था।बिल्कुल टीवी में दिखने वाले शकालाका बूम बूम की पेंसिल जैसा।वही पेंसिल जिससे कुछ भी बनाओ कागज पर वो हुबहू कागज से निकल हमारे सामने आ जाता है।ऐसा टीवी प्रोग्राम में दिखाते थे।

मंटू नें कन्फर्म करने के लिए पूछा,"क्या ये वही पेंसिल है..शकालाका बूम बूम वाली ?"

"और नहीं तो क्या.."नई दोस्त नें आँखें मटकाते हुए कहा।

"विद्या कसम खाओ..।"किताब में रखे बुलबुल के पंख पर हाथ रखकर मंटू नें पूछा।

"अल्ला की कसम..।"

"अरे मैं विद्या की कसम बोल रही हूँ तू अल्ला की कसम खा रही है।"

"अल्ला ही तो विद्या देता है।"

"चल ठीक है..भगवान की कसम खा फिर..।"

"बोला न अल्ला और भगवान एक ही होते हैं।"

"अच्छा !! पापा से पूछुंगी शाम को।"मंटू नें कन्फ्यूज होकर कहा।

"अच्छा सुन,आज आज के लिए मुझे अपनी ये पेंसिल देगी,मेरे को कुछ चीजें बनानी है फिर मैं तुझे वापस दे दूँगी।"

"क्या बनाएगी..?"

"कुछ नहीं..बस तू दे दे एक दिन के लिए।"

"हम्म..मेरे पास घर पे गोल्डन कलर का स्केच पैन भी है।पापा कल ही लाये थे सूरत से।तू कहे तो वो भी मैं तुझे दे सकती हूँ।"

"क्या..!गोल्डन स्केच पैन ? मैनें तो कभी नहीं देखा।प्लीज ला देना..प्लीज।"मंटू की आँखें खुशी से चमक उठी।

"हम्म पर एक शर्त है।मैं जो कहूँ वो करना पड़ेगा।"नई दोस्त नें सिक्का उछाला।

"तू जो भी कहे मैं करने को तैयार हूँ।"

"तो ठीक है।स्कूल के बाहर जो कीचड़ वाला गड्ढा है न..उसमें सात बार पांव रखना होगा।"

"ये क्या है..सात बार कीचड़ में पांव ?"

"हाँ ये एक तरह का सीक्रेट है।इसी से वो मैजिक पेंसिल काम करेगी।"

दोनों स्कूल के बाहर गड्ढे के पास खड़ी थी।मंटू गौर से कीचड़ देखे जा रही थी।फिर उसे पेंसिल याद आयी और पेंसिल से बनने वाले उसके प्यारे दादू जो तीन महीने पहले ही गुजरे थे,याद आये।उसके बाद उसने ज्यादा नहीं सोचा।सीधे कीचड़ में पांव डाला।पहली बार अजीब सी बदबूदार झनझनाहट हुई जो पूरे बदन में बिजली की तरह कौंधी।लेकिन दादू से प्रेम सच्चा था।वो एक एक कर सातों बार कीचड़ में पांव रखती गई।

अंतिम पांव रखने के बाद कीचड़ से लतपथ जब मंटू नें पेंसिल देने को पूछा तो जोर का ठहाका सुनाई दिया।

"पागल,ऐसी वैसी कोई मैजिक पेंसिल सच में थोड़े ही होती है।कितनी बड़ी वाली बुद्धू है रे तू!उल्लू बनाया बड़ा मजा आया।"गाती गुनगुनाती ठहाके लगाती नई दोस्त वहाँ से चली गई।पीछे रह गई मंटू।कीचड़ में सनी हुई।उसे अबकि बार लगा जैसे किसी नें ऊपर से नीचे तक उसे कीचड़ में नहला दिया।मंटू को अपने दादू बहुत याद आये।

पांचवा दिन।

मंटू नें दिमाग लगाया।स्कूल नाम की बला से बचने का बस यही एक उपाय रह गया।

मंटू का स्कूल घर से चंद कदम ही दूर था।लेकिन इन चंद कदमों से पहले उसकी दोस्त का घर बीच में आता था।जिसके घर के बाहर बरामदे में बनी कॉर्नर की एक छोटी सी खुफिया जगह में मंटू को एक आइडिया मिला।

"मैं अब यहीं छुप जाया करूँगी।और जब स्कूल की छुट्टी का टाइम होगा तब घर चली जाऊंगी।"

मंटू नें खुद से कहा।

मंटू नें यही किया।उस खुफिया जगह में मुश्किल से आधा घंटा बिताया होगा उसे लगा कितना ज्यादा समय हो गया अभी तक कोई बच्चा स्कूल से बाहर क्यों नहीं आ रहा!

अब मंटू के लिए रुक पाना नामुमकिन था।उसे लग रहा था इससे अच्छा तो स्कूल था यहाँ तो बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा।

और इस तरह मंटू मम्मी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने पापा के स्कूल आयी थी।


-अल्पना नागर