Monday, 10 January 2022

ज़िन्दगी के मायने

 जिंदगी के मायने


ज़िन्दगी अपनी मौज में आगे बढ़ रही होती है..खुशनुमा..खिलंदड़..वाचाल कि तभी अचानक एक ब्रेक लगता है और धड़ाम से मुँह के बल जिंदगी और जिंदगी की पूँछ पकड़े आप..दोनों का सामना जमीनी हकीकत से ! ऐसा क्यों होता है कि आपके बनाये खूबसूरत हवाई किले जरा सी हवा से धराशाही हो जाते हैं..यहाँ गलती आपके द्वारा उस किले निर्माण में चुनी गई सामग्री को लेकर हुई या फिर उस हवा से जो गलती से बेखयाली में उधर से गुजर रही थी..!यहाँ गौर करने लायक बात ये है कि जिंदगी का जरा भी बाल बांका नहीं होना वो मस्त मौला फ़क़ीर सी अपनी मौज में फिर से आगे बढ़ती जाएगी उसे ब्रेक लगा है तो सिर्फ आपकी बेकाबू रफ्तार को नियंत्रित करने के लिए ! जरा सोचिए जिंदगी की ये उठापटक किसलिए.. वो क्यों हमारा ध्यान अपनी ओर खींचना चाहती है..!क्या हमें आत्मावलोकन की आवश्यकता है?जिस रफ्तार से मुखोटों का चलन बरकरार है उसे देखकर तो यही लगता है कि बिल्कुल आवश्यकता है।

कुछ बातें हैं जिनका खयाल नए वर्ष में रखना लाजिमी होगा।अभी हाल ही में एक चौंकाने वाला सर्वे हुआ जिसमें बताया गया कि आज हममें से अधिकांश स्वयं को धोखा देने वाली अजीब सी मानसिक बीमारी से गुजर रहे हैं।आपको मालूम है कि आपका बच्चा पढ़ाई में कैसा है लेकिन आपने ये धारणा पहले से अपने दिमाग में बनाई हुई है कि उसके जितना होशियार दुनिया में और कोई नहीं..आपकी बनी हुई धारणा को बच्चे का खराब रिजल्ट भी प्रभावित नहीं कर पाता क्योंकि वो आपकी बनी बनाई विचारधारा से मेल नहीं खाता।इसी तरह व्यक्तिगत संबंधों में भी बहुत बार हमें ज्ञात होता है कि जिनके साथ हमारी तथाकथिक गहरी दोस्ती है वो दरअसल हमारे छिपे हुए शत्रु हैं जिन्हें संवेदनशील पलों में आपका सबसे अच्छा शुभचिंतक बनने का दिखावा करना होता है और अंततः वही लोग पीठ पीछे आपकी खिल्ली उड़ाने का कार्य करते हैं,हमें दरअसल मालूम होता है कि कौन कितना शुभचिंतक है फिर भी आँखे मूंदे न जाने कौनसे चमत्कार की हम प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।चमत्कार का तो पता नहीं लेकिन ये स्वयं के साथ धोखा जरूर होता है।क्यों न नव वर्ष में आज से और अभी से उन सभी मित्रों से एक निश्चित दूरी बना ली जाए,साथ ही अपने मन की सुनने की भी आदत डाल ली जाए ताकि स्वयं को धोखा देने की किसी भी स्थिति से बचाव हो सके।

हम सभी जानते हैं कि वैश्विक महामारी का ये दौर इतनी आसानी से समाप्त नहीं होने वाला।इसके लिए शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर स्वयं को मजबूत करना होगा।जिंदगी को पुनः पटरी पर लाने के नए तरीके खोजने होंगे जो इस महामारी के चलते हुए भी जीवन के संग तालमेल बिठा सके।क्योंकि जमाना डिजिटल हो चला है अतः डिजिटल खरीददारी से लेकर भुगतान तक बहुत सी ऐसी प्रक्रियाएं हैं जो नई पीढ़ी के लिए तो आसान है किंतु पुरानी पीढ़ी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं।अतः ऐसे में आप अपने घर के बुजुर्गों को जमाने संग कदमताल के उद्देश्य से बहुत सी डिजिटल चीजें सिखा सकते हैं इससे उनमें आत्मविश्वास की तो बढ़ोतरी होगी साथ ही आत्मनिर्भर होने का भी सुख मिलेगा।महामारी के इस दौर में घर से बाहर कदम रखना आत्मघाती हो सकता है अतः डिजिटल जानकारी अपनों के बीच हुई इस दूरी को कम करने में सहायक सिद्ध होगी।

इंटरनेट नें बहुत सी सुविधाएं दी हैं लेकिन ये भी सच है कि बहुत सी चुनौतियां भी इसने दी हैं।बहुत से लोगों नें पाया कि इंटरनेट पर ज्यादा समय व्यतीत करने के कारण उनमें मानसिक तौर पर कुंठा में इजाफा हुआ है साथ ही बहुमूल्य समय की भी अत्यधिक बर्बादी हुई है।ये बात तो निश्चित है कि जमाना अब डिजिटल हो चुका है और अब इसे अपनाना मजबूरी भी हो गया है।हम पूरी तरह से डिजिटल तौर तरीकों पर निर्भर होते जा रहे हैं।बहुत से ऐसे सोशल प्लेटफॉर्म हैं जहाँ लोग अक्सर अपने जीवन से जुड़ी पल पल की तस्वीरें डालते रहते हैं,जहाँ भी नजर डालो लोग बस खुश हो रहे हैं..मित्रों संग अच्छा समय बिता रहे हैं..घूम रहे हैं।उन्हें खुशी के पलों में आनंदित होते देख नैसर्गिक तौर पर कई बार स्वयं के जीवन से तुलना आ जाती है और नतीजा चिड़चिड़ापन,कुंठा, ईर्ष्या..! यहाँ किसी और की नहीं बल्कि स्वयं को बदलने की आवश्यकता है।किसी और का आनंदित होना आखिर क्यों हमें तकलीफ देने लगा!और ये बात भी जान लेना अत्यंत आवश्यक है कि जो कुछ भी हमारी आँखें देख रही हैं जरूरी नहीं कि दृश्य वास्तविक रूप में वही है।वर्तमान में दिखावे का चलन है और इसके लिए लोग कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।आपकी आँखें वही देखेंगी जो आप देखना चाहते हैं।तो क्यों न मन को तैयार किया जाए।हर एक के पास कोई न कोई रचनात्मक गुण अवश्य होता है जरूरत है तो बस पहचानने की..क्यों न अपनी ही एक रचनात्मक दुनिया बनाई जाए जहाँ आप और आपके आनंद के सिवा कोई और न आने पाए!

आपने एक बात गौर की होगी,सोशल मीडिया पर समय बिताते हुए आप पाएंगे कि जो भी आप सर्च कर रहे हैं उसी से संबंधित चीजें घूम फिरकर आपकी नजरों के सामने बार बार आ रही हैं।जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है ये घूम फिर कर उन्हीं चीजों से हमारा सामना कराती है जो पहले से हमारे मन मस्तिष्क में मौजूद होते हैं चाहे वो हमारी महत्वकांक्षा हो या फिर हमारे अंदर छुपा डर !

तकनीकी के इस दौर में तकनीक से जुड़ना हमारी सुविधा से अधिक मजबूरी या फिर कह सकते हैं आदत बन गया है।आपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कभी न कभी उपवास तो किया होगा।उपवास के दौरान आत्म नियंत्रण की जो प्रवृति विकसित होती है वो शरीर और मन दोनों के लिए हितकारी होती है।उपवास के दौरान शरीर और मन दोनों से विषाक्त पदार्थों का उत्सर्जन होता है।बस वही जरूरत आज हमें इंटरनेट उपवास की है।सप्ताह में एक दिन ऐसा सुनिश्चित करें जब मोबाइल या इंटरनेट से वास्ता बिल्कुल न रहे।इस दौरान आप वही सब कार्य करें जो बहुत समय से आपने टाल रखा था या यूं कहें इंटरनेट पर समय अधिक देने के कारण समय ही नहीं मिल पा रहा था!किसी बहुत ही करीबी मित्र को या प्रिय को पत्र लिखें, कोई पुस्तक जो आप लंबे समय से पढ़ना चाह रहे थे उसे पढ़ें..घर की बगिया को सँवारे एक दिन के लिए माली बन जायें..अपने हाथों से कोई पसंदीदा व्यंजन तैयार करें..मौसम से दोस्ती करें..खिड़की से बाहर झांकें धूप बारिश जो भी आपकी प्रतीक्षा में बाहर बैठी है उससे नजरें चार कर आएं।बच्चों की खिलखिलाहट में खुद को शामिल कर आएं..खुद को सँवारे आईने में झांकें,खुद की पीठ थपथपाएं तारीफ कर आएं..कोई भी रचनात्मक कार्य करें जिसे करके आपको सुकून की अनुभूति हो..फिर देखिए जिंदगी के सिरे किस तरह आपसे जुड़ते चले जायेंगे,बरसों से कोने में धूल फांकती मन की वीणा का एक एक तार झंकृत हो उठेगा।तकनीकी रूप से खुद को डिटॉक्सिफाई करने का ये विचार आपके जीवन को निश्चित रूप से नई दिशा देगा..आजमा कर देखें।

क्या आपने कभी महसूस किया है कि चीजों को हर बार आगे के लिए टालने की प्रवृति किस कदर आपके जीवन में घुसपैठ कर गई है..! "कल कर लेंगे यार..क्या फर्क पड़ता है..कौनसी ट्रेन छूटीजा रही है..कल करता हूँ पक्का..! ऐसे कई जुमले निजी जीवन में परिचितों से सुने भी होंगे और आपने कहे भी होंगे।देखा जाए तो कल कभी नहीं आता।जो भी है आज है अभी है..भविष्य पर टाली गई चीजों का अस्तित्व भविष्य की ही भांति अधर झूल में लटका होता है।फिर एक दिन ऐसा आता है कि पेंडिग चीजों का ढेर आपके सामने लगा होता है आप कुछ नहीं कर पाते और उसी ढेर में धीरे धीरे स्वयं भी विलीन हो जाते हैं।आप जानते हैं संसार में घटित होने वाली हर घटना एक क्षण में घटित होती है।एक छोटे से विचार में बड़ी बड़ी भामाशाह योजनाएं छिपी हो सकती हैं,एक अदने से बीज में भरा पूरा जंगल और एक छोटे से निश्चय में संपूर्ण इतिहास और भविष्य की तिथियां..!क्षण महत्वपूर्ण हैं ये टालने के लिए अस्तित्व में नहीं आते।

आपने कभी सुना होगा असफलता की कोख में सफलता पल रही होती है बस वो थोड़ी देर का विलम्ब होता है लेकिन उसे आना जरूर होता है।कुछ भी स्थाई नहीं है यहाँ तक कि सफलता का जश्न भी..! और न हीं असफलता का दुःख मनाना..!दिन ढलने पर ही अगले दिन की तैयारी होती है।सूर्य का ढलना उसके अगले दिन के प्रगटीकरण का ही संकेत है।जरूरी है तो हमारी चेतना का बने रहना उसकी उपस्थिति के बिना स्वयं के अस्तित्व का भान भी असंभव है।हम सभी को जन्म से स्वयं के लिए और स्वयं से जुड़े संसार के प्रति एक जिम्मेदारी दी गई है,सर्वप्रथम इसे पहचानना और तत्पश्चात पूरे मनोयोग से उसे निभाना ही जीवन का वास्तविक उद्देश्य है।


-अल्पना नागर

Thursday, 14 October 2021

अपडेटेड दशानन

 

अपडेटेड दशानन

हर एक की चाह
बस चाहिए थोड़ा और
'अतिरिक्त' उत्थान
कोई भला मुझसे पूछे
अतिरिक्त होने के नुकसान !

कितना कष्ट होता है
जब बीस आँखों से खंगालनी होती हैं
एकसाथ फेसबुक ट्विटर और इंस्टा की
नित नई अपडेट्स..
बीस हाथों को समझा बुझा
टाइप करनी होती है पोस्ट और टिप्पणियां/

उफ्फ!कितना दुष्कर होता है
जब भेड़ों के झुंड की भाँति
हाँककर लाना होता है
एक ही दिशा में
दसों दिशाओं की तरह विभाजित
दस मस्तिष्क को/
दुःख की तो पराकाष्ठा तब होती है जब
दस जुबान से निकली बात भी
कोई सुनता नहीं..
सिवाय कर्तव्यनिष्ठ स्वयं के
बीस कानों के..!

मुश्किल तो तब है जनाब
जब इतना कुछ अतिरिक्त होने के बावजूद भी
'मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ '
की एक जिद पड़ जाती है भारी
कहलाने लगता हूँ दुराचारी
फिर होता है सामना
अनगिनत कटु शब्द बाणों का/
और सूखता जाता है
अति आत्मविश्वास का
'सीक्रेट' नाभि अमृत..!

इसके बाद भी मैं दशानन
अमर था अमर रहूँगा !
मैनें चढ़ा लिया है अपनी देह पर
ढीठता का मुल्लमा
कानों में ठूँस लिए हैं
निंदा प्रूफ ईयरप्लग
अपनी जुबान को कर लिया है
प्रोफ़ाइल की तरह लॉक..
मैं जान चुका हूँ
मेरे दस के दस सिर हैं
निहायती निकम्मे चापलूस
और एकदम आउटडेटेड/
फिर भी नहीं करूँगा
मरते दम तक उनका परित्याग
आखिर उन्हीं से तो बनती है
मेरी हीरो वाली पहचान!

तो क्या समझे
दशानन का टाइम आउट..!!
न न बिल्कुल नहीं..!
मैं नई तकनीक का
एडवांस फायरप्रूफ रावण हूँ
बिल्कुल हैप्पी बर्थडे वाली
मैजिक मोमबत्ती जैसा..!
बस थोड़ा उकता गया हूँ
पुराने तौर तरीकों से
अब मेरा पसंदीदा कार्यक्षेत्र होगा
तुम्हारा मस्तिष्क!
न लंका जलने की चिंता
और न ही खतरा किसी भेदी विभीषण से/
जनाब मैं एक नहीं अनेक रूप में
पाया जाऊँगा..!

तुम लगाते रहो मेले
जलाते रहो प्रतिवर्ष मेरा पुतला
आखिर मनोरंजन भी तो
आवश्यक है !
लेकिन हाँ,अब भी अगर चाहते हो
अतिरिक्त होना
तो भूल मत जाना
कितना मुश्किल होता है
ज़माने के हिसाब से
अपडेटेड दशानन होना..!

-अल्पना नागर
14-10-2021

Tuesday, 3 August 2021

अवसाद : कारण एंव उपाय

 अवसाद: कारण एंव उपाय


आज के इस तेज रफ़्तार दौर में जो शब्द सबसे अधिक सुर्खियों में रहा है वो है 'अवसाद'।

हम आये दिन अखबारों और समाचारों के माध्यम से जानते हैं कि फलां युवा नें आत्महत्या कर अपनी ईहलीला समाप्त कर ली या फिर चौरासी साल के बुजुर्ग अपने घर में सुसाइड नोट के साथ मृत मिले।ये सब घटनाएं पिछले कुछ समय से इतनी अधिक बढ़ गई हैं कि अब इनके बारे में जानकर कोई आश्चर्य नहीं होता,इसे हमने सामान्य प्रक्रिया मानकर स्वीकार कर लिया है,लेकिन जब हम स्वयं इस तरह के दौर से गुजरते हैं तो घटनाओं की गंभीरता का पता लगता है।

सबसे पहले तो ये जान लें कि अवसाद आखिर है क्या..!कोई घटना या प्रतिकूल परिस्थितिजन्य अनुभव आपके जीवन को इतना अधिक प्रभावित करता है कि मृत्यु जीवन से अधिक सरल और सहज उपाय नजर आता है।पीड़ित व्यक्ति के मन मस्तिष्क का अनवरत शोर अंततः उसे स्थाई चुप्पी की ओर धकेल देता है।यहाँ यह जान लेना आवश्यक है कि चिंता और अवसाद में काफी अंतर है।कोई भी चिंता अवसाद नहीं होती,हर समस्या का कोई न कोई समाधान अवश्य होता है,बशर्ते हम स्वयं उसका समाधान चाहें तो ! लेकिन वही चिंता शनै शनै अवसाद में परिवर्तित होकर कब चिंता को चिता में बदल देती है इसका आभास तक नहीं होता।वर्तमान में यही परिदृश्य चारों ओर नजर आता है।महज चौदह साल का बालक जब मोबाइल न दिलाने के कारण अपनी जिंदगी ख़त्म कर लेता है या कोरोना पीड़ित कोई महिला पड़ोसी के दुर्व्यवहार और तानों से परेशान होकर जीवन लीला समाप्त कर लेती है या फिर घरेलू झगड़ों से परेशान कोई बुजुर्ग बालकनी से कूद कर स्वयं को मानसिक परेशानियों से मुक्त कर लेता है तो इसे क्या कहेंगे..!निश्चित रूप से इन सभी घटनाओं में धैर्य की कमी और साथ ही जीवन के प्रति दिशाहीन दृष्टिकोण परिलक्षित होता है।आज के इस आलेख में हम इन्हीं बिंदुओं पर चिंतन करेंगे।

सबसे पहले अवसाद ग्रस्त व्यक्ति को चिह्नित करना जरूरी है।इस कार्य में निकट परिजन या बेहतर दोस्त भी मदद कर सकते हैं।अवसाद ग्रस्त व्यक्ति धीरे धीरे स्वयं को समाज व हर व्यक्ति से दूर कर लेता है।कई बार विपरीत परिस्थितियों से उबरने के लिए स्वयं के साथ समय बिताना मददगार भी साबित होता है लेकिन स्थिति जब नियंत्रण से बाहर हो जाती है तो आत्मीय जन का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है।अवसाद का कारण कोई भी हो सकता है।अधिकतर युवाओं की समस्या करियर,आर्थिक विपन्नता या प्रेम में विफलता के इर्द गिर्द ही घूमती है।दोनों ही स्थितियों में विफलता सिर्फ एक मानसिक स्थिति है।अगर हम ये मानकर चलें कि जिस क्षेत्र में हमें विफलता मिली वो इस ब्रह्मांड का एकमात्र विकल्प था तो अवसाद से कोई नहीं बचा सकता।जहाँ तक करियर की बात है इंसान के लिए कुछ भी असंभव नहीं।दृढ़ निश्चय अगर हो तो कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।एक राह बंद होने पर दूसरी राह अवश्य खुलती है।आर्थिक स्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहती।धैर्य के साथ स्वयं को संतुलित कर विकट परिस्थितियों से निपटा जा सकता है।इसके अतिरिक्त दूसरा महवपूर्ण बिंदु है प्रेम जो अधिकतर युवाओं के लिए अवसाद का मुख्य कारण है।हर वस्तु की तरह युवा प्रेम को भी अंततः पाने का प्रयास करते हैं,ये बात सच है कि प्रेम एक आंतरिक प्रेरणा का कार्य करता है और अगर किसी को सौभाग्य से जीवन में सचमुच हासिल होता है तो हर एक क्षण सही मायनों में दैवीय प्रतीत होता है लेकिन क्या सभी को मनचाहा प्रेम मिलता है!अगर हम आसपास नजर उठाकर देखें तो पाएंगे कि अधिकतर लोग जीवन में 'एडजस्टमेंट' करके चलते हैं।यहाँ इस मसले पर जोर इसलिये डाल रही हूँ कि अधिकांश युवाओं की समस्या बाहरी न होकर आंतरिक मनःस्थिति से सम्बद्ध होती है और धीरे धीरे समस्या इतना गंभीर रूप धारण कर लेती है कि उसका मूल्य प्राणों से हाथ धोकर चुकाना पड़ता है।क्या जीवन इतना अधिक तुच्छ है कि उसे यूँ ही गँवा दिया जाए!प्रेम में विफलता जैसी कोई चीज नहीं होती।सिर्फ हासिल करने का नाम प्रेम नहीं है वो अनवरत एक नई कोशिका की तरह आपको नया जीवन और प्रेरणा देने का कार्य करता है,वो हर तरह के बाह्य बंधनो से मुक्ति का नाम है।यहाँ युवाओं को ध्यान देने की आवश्यकता है,प्रेम अगर आपके जीवन का अभिन्न हिस्सा है तो आप हर कार्य में उसकी सकारात्मक ऊर्जा को महसूस करेंगे,यहाँ तक कि आपसे जुड़े हुए लोग आपकी आंतरिक चमक के कायल होंगे।आप जहाँ से भी गुजरेंगे खुशबू की भाँति अपने व्यक्तित्व की छाप छोड़ते हुए जाएंगे।जरूरत सिर्फ नजरिये को बदलने की है।हम ईश्वर को कितना ही स्मरण कर लें लेकिन उसे भौतिक तौर पर अपनी आँखों से नहीं देख सकते,हाँ उसके अस्तित्व को अपने दैनिक जीवन में ऊर्जा के प्रवाह की तरह अपनी चेतना में अनुभूत अवश्य कर सकते हैं। किसी वस्तु या व्यक्ति को पा लेने की अदम्य चाह में या तो सफलता मिलेगी या फिर एक नया जीवन ! असफलता जैसी कोई चीज अस्तित्व में नहीं होती ये मान लेना आवश्यक है।संसार जिसे असफलता की संज्ञा देता है वो दरअसल एक नए जीवन,एक नए मोड़ की शुरुआत भर होती है।कोई भी राह रुकती नहीं है अपितु दूसरे मार्ग खोल देती है जरूरत सिर्फ अपनी दृष्टि के विस्तार की है।किसी प्रसिद्ध कवि नें कहा है कि जब किसी पेड़ पर बिजली गिरती है तो वो जलकर काला हो जाता है।उस पेड़ पर न तो चिड़िया बैठती है और न ही वसंत उस पर आता है लेकिन वही पेड़ बैलगाड़ी के पहियों में जुतकर अपने अस्तित्व को एक नया आकार देता है।पेड़ हो या जीवन जब बिजली गिरती है तो या तो अस्तित्व राख हो जाता है या फिर उसे नया जीवन मिलता है।मिट्टी जब घड़े का आकार लेती है तो उसका अस्तित्व भी साकार होता है वरना वो मात्र धूल है,उसी तरह जब दीपक का आकार लेती है तो पल भर में ही अंधेरे को दूर भगाने की ताकत रखती है।अवसाद ग्रस्त व्यक्ति अवसाद के क्षणों में स्वयं को अनुपयोगी मिट्टी मान बैठता है,ऐसा अधिकतर परिस्थितियों वश होता है लेकिन जरूरी ये है कि उसे उसकी वास्तविक उपयोगिता स्मरण कराई जाए,उसे महत्व दिया जाए।

अवसाद अप्रत्यक्ष रूप से एक ऐसा संक्रामक रोग है जिसकी चपेट में न केवल संबंधित व्यक्ति ही आता है अपितु उससे जुड़े हुए दूसरे लोग भी नकारात्मक रूप से प्रभावित होते हैं।ये एक श्रृंखला की तरह है जिसे जितना जल्दी हो सके तोड़ना आवश्यक है।ये एक गंभीर स्थिति है लेकिन हर समस्या की तरह इसका हल भी बेहद आसान है अगर सही दिशा में कार्य किया जाए।कहा जाता है कि अगर आप किसी समस्या में फंसे हैं तो उसका समाधान आपसे अधिक किसी और के पास नहीं है,दूसरे व्यक्ति आपको अच्छी बुरी सलाह अवश्य दे सकते हैं लेकिन उस पर चिंतन कर उस समस्या से बाहर निकलने का रास्ता आपको स्वयं ही खोजना होगा।अवसाद की समस्या अधिकतर स्वभाव से भावुक लोगों के साथ होती है,लेकिन भावुक होना कोई कमजोरी नहीं है,अपितु विचारहीन समाज में ये आपकी अच्छाई और उजले पक्ष को दर्शाता है।अगर हम अपनी अच्छाई को अपनी ताकत बना लें तो शायद ही कोई अवसाद या मानसिक रोग हमारे हृदय पर दस्तक दे।बुद्धि कमोबेश सभी के पास होती है,लेकिन चिंतन का गुण बहुत कम लोगों के पास होता है।बुद्धि एक क्षमता है और चिंतन उस क्षमता का बेहतरीन प्रयोग करने की अवस्था है।चिंतन अभ्यास से और भी ज्यादा निखर सकता है।अगर सही दिशा में चिंतन हो तो व्यक्ति चाहे किसी भी समस्या में स्वयं को फंसा हुआ पाए वो अतिशीघ्र उससे उबरने के रास्ते भी खोज ही लेता है।ये बिल्कुल वैसा ही है कि आप अपने मार्ग पर अग्रसर हैं और भूलवश या भ्रांतिवश आप किसी सूखे कुँए में गिर जाते हैं,अंदर कंटीली झाड़ियां हैं और पीने को एक बूंद भी पानी नहीं,प्यास से आप अधमरे हुए जा रहे हैं और साथ ही चोटिल भी हैं ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे! निश्चित तौर पर हाथ पर हाथ रखकर मौत की प्रतीक्षा नहीं करेंगे अपितु कुँए से बाहर आने के मार्ग खोजेंगे,आपकी तीक्ष्ण दृष्टि कुँए की भीतरी दीवारों पर बने खड्डे या पत्थर खोजेगी ताकि किसी तरह बाहर निकला जा सके,या फिर पूरी क्षमता के साथ आवाज़ लगाएंगे ताकि राहगीर को आपकी आवाज़ सुने और आप बाहर निकल पाएं।आप देखेंगे कि जीवन को बचाने के उस दौर में आपके शरीर पर लगी बाहरी चोटें महत्वहीन हो गई हैं या फिर उनका अहसास तक नहीं हो पा रहा क्योंकि मानसिक रूप से आप अपने अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में हैं।ये बात बिल्कुल सत्य है हमारी सोच का हमारे जीवन पर बहुत गहरा असर होता है।सोच ही हमें बाकी प्राणियों से भिन्न बनाती है।मनुष्य जीवन उसके मस्तिष्क की अनंत क्षमताओं के कारण बेहद अनमोल है,इसका प्रत्येक क्षण कीमती है।हमारे अंदर की जिजीविषा हमें हर क्षण एक नया जीवन देती है,कुछ सार्थक करने को प्रोत्साहित करती है।यही कारण है कि दुनिया में जितने भी चमत्कारी अविष्कार हुए हैं या असाधारण चीजें हुई हैं उसके पीछे साधारण से इंसान की असाधारण सोच ही है।निराशाओं के गर्भ में ही आशाओं के बीज छिपे होते हैं।अगर संसार आपको हताशा के गहरे कुँए में धकेल रहा है तो परेशान होने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है क्योंकि वो आपको कुछ नया और बेहतरीन करने का द्वार खोल रहा है,आपके अंदर छिपी विलक्षण प्रतिभा और क्षमताओं को अनावृत करने का कार्य कर रहा है।जिन लोगों और समाज के कारण आपने स्वयं को अवसाद के लिए चुना है सबसे पहले तो ये जान लें कि वो लोग क्या स्वयं किसी भी ग़लती या असफलता से विमुक्त हैं!अगर नहीं तो उनके सोचने से आपको इतना अधिक फ़र्क क्यों पड़ रहा है,ये जीवन आपका है,इसे संवारने का जिम्मा भी आपका ही है।अगर आप समाज के बने बनाये बरसों पुराने ढांचे से अलग होकर कुछ नया और सार्थक करने का प्रयास करते हैं तो एक क्षण में आप दूसरों की निगाह में अपराधी सिद्ध हो जाते हैं आपका महत्व हीरे से सीधे कोयले के बराबर हो जाता है।ऐसे में ये आप पर निर्भर करता है कि आप अपने अंदर ऊर्जा प्रज्वलित कर अंगार में परिवर्तित होते हैं या राख बनकर अस्तित्वहीन हो उड़ना पसंद करते हैं!

जीवन शीशे की तरह पारदर्शी है हम चाहें तो हर दिन स्वयं के अंदर झाँककर इसे सरल और स्पष्ट बना सकते हैं लेकिन हमें जटिलताएं आकर्षित करती हैं।हम सरलता को अनदेखा कर जटिल चीजों को पाने के लिए लालायित होते हैं।जीवन रूपी सरल पारदर्शी शीशे पर इतनी अधिक जटिलताओं की धुंधली परत छा जाती है कि कुछ भी स्पष्ट देख पाना असंभव प्रतीत होता है।अब यहाँ कमी हमारे चुनाव की है।अतः सरलता को चुनें,जीवन इतना भी कठिन नहीं जितना इसे बना दिया जाता है।

अवसाद की स्थिति में आप स्वयं को जितना हो सके व्यस्त रखें।अकर्मण्यता किसी भी परिस्थिति को और अधिक खराब कर सकती है।हमारे विचारों का हमारे शरीर पर गहरा असर होता है।अकर्मण्यता की स्थिति हमारी चेतना पर जंग जैसा आवरण ओढ़ाने का कार्य करती है।और जैसा कि हम सभी जानते हैं कि लोहा चाहे कितना ही मजबूत हो,जंग लगने पर धीरे धीरे क्षीण होकर अंततः नष्ट हो जाता है।आप जब स्वयं को विपरीत परिस्थितियों से घिरा हुआ पाएं तो सर्वप्रथम ऐसे कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखने का प्रयास करें जिनसे आपको सचमुच आंतरिक प्रसन्नता मिलती है। व्यवहारिक तौर पर उन परिस्थितियों में इन बातों को अमल कर पाना थोड़ा मुश्किल है लेकिन असम्भव नहीं।आप परिजन या दोस्तों के साथ समय व्यतीत करना पसंद नहीं कर रहे तो कोई बात नहीं खुद के साथ समय बिताएं,किसी पार्क में या घर के अहाते में लगे पेड़ पौधों को समय दें,प्रकृति के साथ स्वयं को जोड़ें,हर वस्तु को इस तरह देखें जैसे कि पहली बार देख रहे हैं चाहे वो पेड़ हो,चिड़िया हो,चाँद तारे, बादल हो या फिर बारिश की हल्की फुहार।यक़ीन मानिए आपको आश्चर्य होगा खुशियां आपके इर्द गिर्द हमेशा से मौजूद थी,बस उन्हें देखने और महसूसने का समय नहीं था।छोटे बच्चों के साथ समय बिताएं,उनका व्यवहार ध्यान से देखें आप बहुत सारी चीजें उनसे सीख सकते हैं।आपको गाना गाकर खुशी मिलती है तो गाइये खुलकर,क्यों परवाह करना कि चार लोग सुनेंगे तो क्या सोचेंगे! किसी के पास इतना समय नहीं है कि सिर्फ आप पर ध्यान केंद्रित करे और अगर कोई सचमुच बहुत फ्री है तो सुनने दीजिए क्या फर्क पड़ता है!अगर नृत्य करना पसंद है तो झूमकर नृत्य कीजिये बिल्कुल इस तरह कि कोई आपको नहीं देख रहा,क्या फर्क पड़ता है कि आप बारातियों वाला नृत्य कर रहे हैं!अगर प्रयास किया तो धीरे धीरे आत्मविश्वास की चमक आपकी अभिरुचियों में भी दिखाई देगी।अगर चित्र और रंगों से जुड़ाव है तो उठाइये तूलिका और उड़ेल दीजिए अपना सारा मन सफेद कैनवास पर!कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी बनाई कृति लियोनार्डो या वोन गोग जैसी नहीं बन पाई!बस इतना ध्यान रखें कि वो आपने बनाई है और आप स्वयं में विशेष हैं,इस पूरे ब्रह्मांड में सबसे अधिक ख़ुशगवार और अनोखे व्यक्ति हैं।

आपको घूमना पसंद है तो सोचने में या सही समय की प्रतीक्षा में समय बर्बाद न करें,उठाइये अपना बैगपैक और बाहरी यात्रा से आंतरिक यात्रा की खुशी को अपने अंदर महसूस कीजिये।ये बिल्कुल आवश्यक नहीं कि यात्रा में आपके साथ कोई संगी मौजूद हो,अगर कोई साथ होता है तो अच्छी बात लेकिन नहीं भी है तो कोई बात नहीं,इससे आपकी यात्रा पर विशेष फ़र्क नहीं पड़ने वाला,बल्कि और अधिक आनंद की अनुभूति आप कर सकते हैं,बशर्ते आपको अपने सानिध्य में जीवन जीने की कला आ गई हो।

किसी को आपकी वजह से खुशी हो कुछ ऐसा कार्य करें।मसलन आपके घर में बहुत सी ऐसी चीजें होंगी जिनका प्रयोग आप वर्तमान में नहीं कर पा रहे लेकिन वो किसी और के लिए काफी उपयोगी सिद्ध हो सकता है,आप उन सभी चीजों को एकत्रित कर निकल पड़ें यात्रा पर, कोई न कोई जरूरतमंद अवश्य होगा जिसके लिए आपकी चीजें बहुत मायने रखेंगी।यहाँ बात सिर्फ भौतिक चीजों की नहीं है,इसके अलावा भी हम दिन प्रतिदिन अनावश्यक बातों का ढेर अपने मस्तिष्क में इक्कट्ठा करते रहते हैं।अलमारी बुरी तरह ठसाठस भर जाती है,ऐसे में नई बातों के लिए जगह कैसे बनेगी!अनावश्यक चीजें हों या बातें, निकालते रहिए।जीवन के प्रति दृष्टिकोण को बस थोड़ा सा बदलने की आवश्यकता है बाकी कार्य स्वयं प्रकृति आपके लिए करेगी।इस पूरे ब्रह्मांड में अगर कोई वस्तु स्थाई है तो वो सिर्फ आपकी आंतरिक खुशी है जिसे आपसे कोई नहीं छीन सकता।खुशी को पाने के लिए जबरन प्रयास न करें बल्कि अपने कार्यों से उसे अपनी ओर खींचें।बाहरी तौर पर दिखावटी हँसने का अभिनय सिर्फ आपके चेहरे की मांसपेशियों को थकाने का काम करेगा इसके विपरीत अगर खुशी आपकी आंतरिक चेतना से सम्बद्ध हो जाती है तो जीवन के मायने ही बदल देती है,और अवसाद जैसे शब्द बीते जमाने की बातें हो जाती हैं।


-अल्पना नागर


Friday, 23 July 2021

मिज़ाज

 मिज़ाज


दिन एक उजली रेत का किनारा

चहक़दमी करते लोग

छोड़ते जाते स्मृतियों के निशान..

कोई बनाता घरौंदा

तो कोई करता प्रयास

भुरभुरे दिन को मुट्ठी में भरने का/

मगर दिन को आदत नहीं

एक जगह ठहरने की

वो फिसलता जाता है

रेत-दर-रेत

लम्हा-दर-लम्हा..!


उजली रेत के उस पार

समंदर सी गहरी है स्याह रात

निःशब्द नीरव रहस्यों से भरी रात/


रात की गोद में सर रखकर 

सुकून से लेटती हैं स्वप्न लहरें..

एक मौन संवाद बहता है

दोनों के दरमियां..!

रात खुद नहीं सोती

थपकियां देकर सुलाती है

स्वप्न लहरों को/


लहरें नींद में चलकर

किनारे आती हैं

और छोड़ जाती हैं 

दिन की ड्योढ़ी पर

शंख,सीप और ढेरों कहानियां/

कहानियां जिन्हें

सूरज निकलने पर

चुनता है दिन और

बिखर जाता है शब्द शब्द

झिलमिल किसी चादर सा..!


स्वप्न लहरें खाली हाथ नहीं लौटती

बहा ले आती हैं

सदी की बेचैनियां,आशाएं,अपेक्षाएं

पीछे छूटते स्मृति चिह्न और

स्थाई घरौंदों के भ्रम..!


दोनों प्रतीत होते हैं

एक दूसरे से सर्वथा भिन्न 

मगर मिज़ाज एक ही है/

भुरभुरे दिन की भाँति

समंदर रात भी ठहरती नहीं..

रिसती जाती है अंजुरी से बूँद-बूँद

लम्हा-लम्हा..!


-अल्पना नागर







Saturday, 17 July 2021

फिर से

 फिर से


रेल के कोने में गठरी बनी

नई नवेली दुल्हन

कनखियों से देख रही है

खिड़की से बाहर

लम्हों की भाँति छूटती हुई

पेड़ों की कतारें

बिजली के खंभे/

उसे आभास हो रहा है

सब कुछ उसके संग चल रहा है

मगर हक़ीकत में

सब छूटता जा रहा है

आगे प्रतीक्षा में है

नई जगह..नया स्टेशन !


गाँव में ब्याह के आयी है

नई नवेली बहुरिया

अभी घूँघट कलेजे तक ढलका है

मानो कह रहा हो

अब बात कलेजे से बाहर 

नहीं जा पाएगी !


बहुरिया के आलता लगे पाँव

छोड़ते जा रहे हैं

स्थाई चिह्न

उसके मन मस्तिष्क पर

वो जान चुकी है कि

यही है उसकी आजीवन लक्ष्मण रेखा !


सिंदूर और दूध से रंगे बर्तन में

डाल दी गई है अंगूठी और चंद सिक्के

ननद बाई नें हौले से कुछ बुदबुदाया है

बहुरिया के कानों में!

बहुरिया नें छोड़ दिये हैं हर बार

हाथों में आये सिक्के और अंगूठी

वो जानती है

उम्र भर दोहराया जाएगा 

यही पूर्व निर्धारित 'अकी बेकी' खेल

जिसमें हर सूरत में तय है उसकी हार !


पल्लू का सिरा मुँह में दबाए

ठिठोली करती दर्जनों औरतों का हुजूम

अब करेगा मुँह दिखाई

नई नवेली बहुरिया की..

घूँघट के भीतर भी

एक और घूँघट है

हया का घूँघट !

जो बहुरिया की माँ नें 

देहरी पार करती बिटिया के पल्लू बांधा था

सीख देकर कसकर गाँठ लगाते हुए..


अब गाँव भर में घुमाकर

ली जाएगी

देवी देवताओं की अनुमति..

एक भी देवरा छोड़ा नहीं जाएगा

मंगल गीत गाये जाएंगे!


बहुरिया को देख

खिल उठी हैं

घर की दूसरी औरतों की बांछे

अब जवाब देने लगे हैं

सभी के घुटने यकबयक !

बहुरिया के आने से सब खुश हैं

सिवाय रसोईघर के..

वो राजदार है

बहुरिया की दुखती पिंडलियों

और कठोर होते हाथों के स्पर्श की/


रसोई को मालूम है

किस तरह रोज बहुरिया

लड़ती है

परात भर आटे में गुँथे

चुटकी भर नमक जितने सपनों के संग/

वो जितनी मशक्कत करती है

उतनी ही बढ़ती जाती है

गुँथे आटे की लचक..!

फिर आहिस्ता से डालती है

बेली हुई रोटियां

सार्वभौमिक सत्य से गर्म तवे पर..

सेकती है धैर्य को

पूरी तरह पकने तक..!

तब जाकर आता है स्वाद

तब जाकर भरता है कुटुम्ब का उदर !


बहुरिया नें सीख लिया है

बातों को कलेजे के भीतर रखना

मगर छुपा नहीं पाती

खिड़की से पिघलकर आते चाँद से/

बहुरिया पढ़ी लिखी है

उसने लिखी हैं चंद पंक्तियां

छुपते छुपाते

रात के गहराते सायों के बीच..

उसे नहीं पता 

आख़िर वो क्या करे 

कागज़ पर उकेरे अक्षरों के सैलाब का !


आज फिर उतरकर आया है चाँद

खिड़की पर..

बहुरिया व्यस्त है

एक जरूरी काम में !

उसने बनाये हैं

ढेर सारे हवाईजहाज

उन्हीं कागज़ों से 

जिन पर उकेरी थी उसने कविताएं/

एक एक कर वो रोज भेजेगी

उड़ान भरता हवाईजहाज

सीधे चाँद के घर !


बहुरिया हैरान है

ये जानकर कि

चाँद के पास पहले से लगा है ढेर

ऐसे अनगिनत कागजी जहाजों का !


आज फिर से दूर किसी घर से

सुनाई दे रहा है

शहनाई का रुदन..

फिर होगी मुँह दिखाई

देवी देवरा घुमाई

आटे से रोज की लड़ाई

और सपनों की जमकर धुनाई/

फिर होगी चाँद से बातें

फिर से उड़ेगा कोई कागज़ का जहाज

फिर रोयेगा चाँद 

और टूटकर पिघलेगी चाँदनी!

फिर से घुलेंगे काले अक्षर 

गहराती रात के स्याह पन्नों में..!

एक बार फिर से..हाँ फिर से..!!


-अल्पना नागर

Sunday, 2 May 2021

कहीं कोई गतिरोध नहीं

 कहीं कोई गतिरोध नहीं!


सामान्य है सब

हालात से लेकर जज़्बात

कहीं कोई गतिरोध नहीं !

वही मटमैला आसमान

वही सूरज का रोज का संघर्ष

कि निकल आये किसी दिन

गहरी चुप्पी से पसरे घुप्प धुएँ को चीरकर/

देखे अपना प्रतिबिम्ब 

चमकते बेफ़िक्र चेहरों में..

मगर वो जान चुका है

ये मात्र दिवास्वप्न है..!!


धुआँ आखिर धुआँ है

क्या फर्क पड़ता है

कहीं से भी उठे..!!

चाहे दंगों से उठे या उठे

हमारी निष्क्रियता से/

हम सुरक्षित हैं

अपने 'एयर प्यूरीफाइड' घरों में

हम सुरक्षित हैं

दोहरे आवृत चेहरों को 

'डबल मास्क' से ओढे..!

मगर फिर भी जाने क्यूँ

इस बार ये धुआँ कुछ अलग है

तमाम सुरक्षा चक्रों को भेदता हुआ

भर गया है नथुनों में

फेंफड़ों में..!

जल रहे हैं जिस्म

जल रही हैं उम्मीदें/

मगर आँखों को अब नहीं होती जलन

न ही ये बरसती हैं पहले की तरह

चाहे कितना ही धुआँ पसरा हो आसपास!


एक अदृश्य चक्रवात से

उड़ गई है एक ही झटके में

जाने कितने भरोसों की

'आभासी' छत..!

अब जो भी करना है

खुद को करना है

खुद को सहना है..!!


धुएँ से टपक रही है

अवसरवादिता

जिसे लपकने को दौड़ रहे हैं

जाने कितने ही हाथ..

खोखले सिलेंडर थामे

अजीब सी मैराथन का हिस्सा बनने

भाग रहे हैं एकसाथ कई नीरो

माहौल में घुल गया है

बाँसुरी का रुदन..

धू धू कर जल रहा है रोम/

और वेंटिलेटर पर दम तोड़ रही हैं

भीड़तंत्र की उम्मीदें..!

हम देख रहे हैं

अब तक

सब कुछ सामान्य है

हालात से लेकर जज़्बात

कहीं कोई गतिरोध नहीं..!!


-अल्पना नागर

2/5/2021









Sunday, 14 March 2021

पलाश

 ये पलाश के खिलने का समय है


साजिशन धरती की पीठ पर

उभर आये हैं नीले निशां

आदतन पेड़ों नें गिरा दिया है

जर्द पत्तों का पीला कम्बल..!


किसी नें खोल दिया है

सुराहियों में कैद हवा का ढक्कन

बौराई हवा मुक्त हो गई

मानो कुलांचे भरती 

दूर जंगल में हिरनी कोई..!


दूर कहीं सूनी पड़ी है शाख

ये गुलमोहर के आराम का समय है..!

उसी के नज़दीक

बस चंद पेड़ों की दूरी पर

कोई है जो टिका हुआ है शाख से अब भी/


मेरी हैरानगी को भांपते हुए

हौले से हवा बुदबुदाई..

"ये दहकते अंगार

रात की डाली पर

टिमटिमाते तारों का झुरमुट हैं

जो दिन के उजाले में

पलाश बन इठलाते हैं..!!"

जी हाँ, यही हैं वो

जो वक़्त की साजिशों को 

हर बार झुठलाते हैं..!


देखना,अभी और चटख होगी

धूप की हल्दी/

अभी और निखरेगा रंग धरा का

ये पलाश के खिलने का समय है..!!


-अल्पना नागर

12 मार्च 2021