Thursday, 3 August 2017

कहानी- दादू

कहानी
दादू

रघुनाथ प्रसाद...हाँ,यही नाम था उनका।लेकिन परिवार और मुहल्ले के सभी लोग उन्हें दादू कहकर पुकारते।उम्र होगी करीब निन्यानवे साल,शतक में सिर्फ एक वर्ष कम।आँखें धंसकर अंदर तक चली गई थी,बहुत कम लगभग नगण्य दिखाई देता था।अवस्था को देखते हुए पैरों नें भी लगभग साथ छोड़ दिया था,ज्यादातर समय बिस्तर पर लेटे हुए ही बिताना होता था।बस उनके पैरों में जबरदस्त हरकत सिर्फ तभी होती जब मुहल्ले के कुछ शैतान बच्चे जोर से उनके कानों में 'जय श्री राम' चिल्लाकर भाग जाते,और वो बिस्तर के पास रखी अपनी छड़ी को टटोलकर उनके पीछे भागने का प्रयास करते।दरअसल रघुनाथ प्रसाद जी नें जवानी के दिनों में हर वर्ष होने वाली रामलीला में हनुमान का किरदार बड़ी शिद्दत के साथ निभाया,अपने अभिनय के किस्से बड़े ही जायके के साथ मुहल्ले के सभी छोटे बड़े लोगों को सैंकड़ों बार सुना चुके थे।सभी लोगों की जुबान पर उनके किस्से लगभग रटे हुए थे।
उम्र के इस पड़ाव पर वो काफी वृद्ध हो चुके थे लेकिन ऐसा नहीं है कि उन्हें परिवार के लोगों से कोई सरोकार नहीं था,परिवार के हर छोटे बड़े निर्णय में उनका जबरदस्त दखल था।दादू नें अपनी अहमियत डंके की चोट पर मनवा रखी थी,अगर गलती से भी उनकी शान में किसी नें गुस्ताख़ी की तो बस उसकी खैर नहीं,दादू का भाषण दो घंटे पहले नहीं रुकता था।घर में तीन बहुएं थी।और नियम बनाया हुआ था कि रोज प्रातः पौं फटने से पहले तीनों बहुएं एक एक कर दादू के चरण स्पर्श करने आये।"आज मंझली बहु नहीं आयी!",दादू नें पूछा।
"दादू आज वो मायके चली गई" बड़े पोते नें कहा।
"ऐसे कैसे चली गई ,बिना हमें बताये,बिना आशीर्वाद लिए?"
"अरे दादू आप सोये हुए थे अपनी दवाई खाकर,इसलिए उठाया नहीं।"पोते ने सफाई देते हुए कहा।
दादू की जीभ समय समय पर विभिन्न तरह के पकवानों की सिफारिश करती।वैसे तो दादू की आँखें लगभग बुझी हुई ही थी लेकिन आसमान में घूमते फिरते बादल उनकी आँखों से बचकर नहीं निकल पाते थे।फिर फरमान जारी किये जाते,"आज तो बेटा पकौड़े का मौसम बन गया है।"
इसी तरह जब भी बहुओं के मायके से कोई आता,चाहे वो नौकर ही क्यों न हो,सबसे ज्यादा दादू ही उत्साहित होते।तुरंत फ़रमान निकाला जाता ,"अरे बहु ,आज तो तेरा भाई आया है,समोसे तो बनने ही चाहिए इस खुशी में।"
और फिर अगले दिन दादू पाखाने के इर्द गिर्द ही नजर आते।
दादू नें शिक्षा के नाम पर सिर्फ 'क' अक्षर लिखना सीखा।विद्यालय में मास्टर जी नें उनके धोती कुर्ता पहनने पर आपत्ति जताई और दादू फिर कभी नहीं गए विद्यालय।दादू अक्सर मुहल्ले के बच्चों से जिरह करते दिख जाते थे।अख़बार के किसी टुकड़े पर अगर उन्हें 'क' जैसी अक्षर आकृति दिख जाती तो उनके चेहरे पर चौड़ी सी मुस्कान फ़ैल जाती।वो 'फ' अक्षर को भी 'क' बताते,उनके दिमाग की सुई बस वहीं अटक जाती और जिद करने लगते कि वो एकदम सही हैं बाकि सब लोगों को कोई ज्ञान नहीं है।
एक रोज़ दादू अपने कमरे से बाहर नहीं आये,और न ही खाना खाया,सब नें बहुत मनाया,काफी दिमाग़ दौड़ाया कि कहीं कोई भूल चूक तो नहीं हुई जिससे दादू नाराज़ हैं।अंत में दादू नें राज से पर्दा उठाते हुए कहा कि "नाती की शादी है,सभी नें एक से बढ़कर एक कपड़ों की खरीददारी की है लेकिन मेरे लिए ? मेरे लिए सूती कुर्ता?अभी इतना बूढ़ा भी नहीं हुआ हूँ।मुझे अपने इकलौते नाती की शादी के लिए सिल्क का कुर्ता चाहिए बस।"दादू के फ़रमान से सभी का मुँह एक पल के लिए बस खुला ही रह गया।आनन् फानन में बढ़िया किस्म का सिल्क कुर्ता लाया गया।तभी दादू नें अपना उपवास खोला।
उस रोज़ दादू का सौवां जन्मदिन था।ऋषि पंचमी का दिन था।दादू सुबह से ही उत्साहित नजऱ आ रहे थे।बढ़िया तरीके से एकदम कड़क प्रेस किया हुआ झक सफ़ेद कुर्ता पहना।बालों में डाई भी करवाई।भई आज फ़ोटो भी तो खिंचनी थी!अपनी छड़ी उठाकर धीरे धीरे लगभग रेंगते हुए चलने का प्रयास किया।घर भर के तीन चार चक्कर लगा चुके थे दादू लेकिन ये क्या सभी अपने काम में इतने व्यस्त !,किसी को दादू की तरफ झांकने की भी फुर्सत नहीं! दादू नें बच्चों को बुलाया,अपने कुर्ते की जेब से पान के फ्लेवर वाली टॉफी निकाल के दी,ये टॉफियां दादू सिर्फ अवसर विशेष पर ही बच्चों को बांटते थे।बच्चे पूछने लगे,"दादू दादू आज क्या है?बताओ न।"
"कुछ नहीं बस ऐसे ही"।अनमने मन से दादू नें कहा।
थककर दादू अपने कमरे में चले आये।शाम को छोले भटूरे की गंध नें जब दादू के नथुनों को छेड़ा तो दादू मन मसोस कर रह गए।
"सुंगध पक्का पड़ोस से ही आ रही है,मेरे घर में तो किसी को खबर भी नहीं कि आज मेरा सौवां जन्मदिन है,हुंह..।"दादू नें मन ही मन सोचा।
"बाबूजी चलिये,सब इंतज़ार कर रहे हैं।"
"क्यों भला?"
"खुद ही देख लीजिए चलकर।"
चौक में पहुँचते ही ढेर सारे गुब्बारे,और जन्मदिन के स्टिकर्स देखकर दादू की धुंधली आँखें भी ख़ुशी से छलक उठी।सामने एक बड़ा सा केक रखा था,दादू नें बड़े ही चाव के साथ पहली बार केक काटा।लेकिन तभी दादू का चेहरा उतर गया।और दादू बड़ी ही मासूमियत से बोले,"अगर तुम्हारी दादी संध्या आज जीवित होती तो आज के दिन खीर जरूर बनती।"
फिर क्या था,घर की बहुएं फटाफट खीर बनाने में जुट गई।आधे घंटे के अंदर अंदर दादू के लिए विशेष रूप से खीर बनाई गई।
मधुमेह के रोगी दादू अपनी मनपसंद शुगर फ्री खीर खाकर फूले नहीं समाये।
यूँ तो परिवार का हर सदस्य दादू का पूरा ख्याल रखता लेकिन कभी कभी किसी कारणवश अगर सदस्य व्यस्त हो जाते या दादू की तरफ ध्यान नहीं जा पाता तो वे किसी न किसी तरह ध्यान आकर्षित करवाकर ही रहते।
एक रोज़ इसी तरह रविवार की सुबह सब लोग अपने अपने बकाया कामों को निपटाने में व्यस्त थे,दोपहर तक दादू की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं गया।अचानक ही दादू नें सहारे के लिए अपनी छड़ी उठाई और सब लोगों से पूछना शुरू कर दिया,"देखना जरा बेटा, मुझे लग रहा है मेरे दाएं हाथ में सूजन है,शरीर भी तप रहा है।"
"नहीं बाबूजी,तापमान तो एकदम ठीक है,और सूजन भी नहीं है,आप आराम कीजिये।"बेटे नें हाथ छू कर कहा।
दादू नें बेटे से लेकर पोते पोतियों घर के माली और नौकर तक से पूछ डाला लेकिन सभी का एक ही जवाब।
"किसी को मेरी कोई फ़िक्र नहीं,लगता है अब मैं फालतू का कबाड़ हो गया हूँ जिसकी किसी को कोई ज़रूरत नहीं।"दादू भावुक हो उठे।
तभी सबसे बड़ी वाली पोती नें दादू को देखा और कहा "हाँ दादू सूजन तो है हाथ में और आपका सर भी तप रहा है,लाइए मैं दवाई लगा देती हूं।"
पोती थोड़ी देर दादू के पास बैठी ,दादू से दो चार मन की बातें भी कर ली।सर पर हल्का सा बाम लगा दिया।
पास ही खड़ी बहु नें आश्चर्य से पुछा,"क्यों री छुटकी, ऐसा कौनसा बुखार आ गया था दादू को जो सिर्फ तुझे ही दिखाई दिया,हम सब नें अच्छी तरह चेक तो किया था, कुछ नहीं है दादू को।"
"हाँ,जानती हूँ चाची, दादू एकदम ठीक हैं,पर उन्हें दवाई से ज्यादा स्नेह और अपनेपन की जरुरत थी।आज सभी बहुत ज्यादा व्यस्त हो गए थे।और आप तो जानती हैं,हमारे दादू एकदम बच्चों की तरह हैं।"पोती नें मुस्कुराते हुए कहा।
तो ऐसे थे दादू उर्फ़ रघुनाथ प्रसाद जी।
प्रेमचंद जी की प्रसिद्ध कहानी 'बूढी काकी' की एक उक्ति यहाँ याद आ रही है , "बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है।"

अल्पना नागर©


Friday, 28 July 2017

लघुकथा

बस स्टॉप

लड़का बहुत तेज गति से चलता था लेकिन न जाने क्यों उस सांवली सी मोटे चश्मे वाली लड़की को देखकर उसकी गति स्वतः धीमी पड़ जाती थी।घर से बस स्टॉप की दूरी यही कोई दस मिनिट पैदल चलने तक की होगी।लड़की चेहरे से साधारण,कृशकाय,गंभीर प्रवृति की.. लेकिन कुछ अजीब सा आकर्षण था उसकी आँखों में..लड़की का नाम था आशिमा।लड़का दिखने में आकर्षक,सुडौल व ओजस्वी था,नाम था उसका विनीत...दोनों एक ही जगह रसायन विज्ञान विषय का ट्यूशन पढ़ने जाते थे।लड़का आजकल रोज बसस्टॉप पर तीन बसें निकल जाने के बाद तक भी खड़ा रहता,इस दौरान उसकी नजर सामने रास्ते पर ही लगी रहती,फिर अचानक दूर से उस सांवली परछाई को देखकर उसकी आँखों की चमक बढ़ जाती।आँखों के संपर्क से शुरू हुई दास्तान धीरे धीरे मुस्कराहट में तब्दील होने लगी।ये उन दिनों की बात है जब घर घर में टीवी पर मात्र दूरदर्शन के ही दर्शन हो पाते थे,उस वक्त जरा वक्त फुर्सत में था,आज की तरह 'फॉर जी' जमाना नहीं था।हां तो हम बात कर रहे थे 'केमिस्ट्री' की...बस में सीट मिल जाने पर लड़का अपनी सीट लड़की के लिए छोड़ देता था..बदले में हल्की सी मुस्कराहट पाकर वो अपनी 'सीट' भी पक्की कर रहा था।रास्ते भर लड़की अपनी केमिस्ट्री की बुक निकालकर पढ़ती रहती।उन दोनों की निःशब्द 'केमिस्ट्री' में भी एक मीठी सी ताजगी थी।कभी कभी लड़की भी अपनी बगल वाली खाली सीट पर पर्स रख देती थी,जिसे लड़का चुपचाप हटाकर बैठ जाता था..लगभग दो साल तक मुस्कुराहट से लबरेज ये शांत सफर यूँ ही चलता रहा।उस रोज ट्यूशन का आखिरी दिन था..लड़की किसी तरह अपने हाथों की कंपन को छुपा रही थी,बार बार उसका हाथ पर्स में जाता और लौट आता..आख़िरकार बस स्टॉप पर इंतज़ार किया जा रहा था..लेकिन आज बस का नहीं,लड़के का इंतज़ार था..लड़का आज ट्यूशन पर नहीं आया था।तीन बसें जा चुकी थी,ये आखिरी बस थी उसके बाद चार घंटे का लंबा अंतराल।लड़की की आँखें लगातार रास्ते पर थी..तभी उसे लड़का दिखाई दिया ..उसके हाथ में कुछ था,शायद कोई डायरी..उस रोज़ फ्रेंडशिप डे था।लड़के नें हमेशा की तरह मुस्कुराया और लड़की के हाथ में डायरी थमा दी।डायरी के पन्ने खाली लेकिन गुलाब की खुशबू से भरे थे।बहुत कुछ लिखा जाना था उनमें..लड़के के सुनहरे सपनें.. आशाएं..बहुत कुछ..लेकिन तभी लड़की नें हिम्मत कर काँपते हाथों से पर्स में से कुछ निकाला..विवाह निमंत्रण था शायद..लड़के को पत्र थमाकर बिना रुके बिना पीछे मुड़े आखिरी बस से लड़की चली गई।वो बस आखिरी थी,उसके बाद का समय पंख लगाकर उड़ गया।
आज लगभग पांच साल बाद फिर उसी बस स्टॉप पर अचानक किसी नें नाम पुकारा 'विनीत' रुको बेटा! लड़के नें चौंककर पीछे मुड़कर देखा,एक पिता अपने चार साल के शरारती बच्चे को पकड़ने का प्रयास कर रहा था,नन्हे की अठखेलियां देख साथ में खड़ी एक स्त्री धीमे धीमे मुस्कुरा रही थी।लड़के नें एक पल को ठहरकर उस स्त्री की आँखों में देखा..समय जैसे ठहरकर पांच वर्ष पीछे मुड़ गया।आज भी वही मुस्कुराहट..वही आँखों की चमक..वही गंभीरता।
लड़के का हाथ भी नन्ही उंगलियों नें थामा हुआ था।पास ही खड़ी एक बुजुर्ग औरत नें नाम पूछा, बच्ची नें चहककर अपना नाम बताया..आंटी ...'आशी' घर पर और 'आशिमा' स्कूल में।
बस स्टॉप की भीड़ नॉन स्टॉप जारी थी।

अल्पना नागर

Sunday, 23 July 2017

कविता- शिवोहम

शिवोहम

मैं ही ध्वनि
मैं ही प्रकाश
मैं ऊर्जा पुंज
मैं ही विनाश
सृष्टि नियंता
मैं भ्रमहर्ता,
मैं शून्य से परे,
शून्य में निहित
पारदर्शी और
अभौतिक
मैं ही निरंतर
मैं अचल!
सर्व से जुड़ा
स्वयं से परे,
तम का नाशी,
अविनाशी
हर क्षण में हूँ
कण कण वासी,
मैं त्रयम्बकं
मैं गरल धारी
शिवोहम.. शिवोहम.. शिवोहम..

अल्पना नागर ©




एक नदी की शल्य चिकित्सा -कविता

एक नदी की शल्यचिकित्सा

हटो हटो
यहाँ की जा रही है
शल्यचिकित्सा !
बड़े ही धीर गंभीर
चिकित्सकों द्वारा
कागजों पर
शल्यचिकित्सा!
मर्ज भी तो खास है
हुआ इक नदी को
हृदयाघात है !
नदी को हृदयाघात !!
ये क्या नया बवाल है?
भई ये कैसा गोलमाल है!
देह में क्या फैला हुआ
धमनियों का जाल है?
सांस तो 'हम' लेते हैं,
चलते हैं फिरते हैं गाते हैं,
दमखम को अपने
दुनिया को दिखलाते हैं,
नदी क्या कोई इंसान है!
सुन न पाई नदी और कुछ,
आखिर में वो
बोल पड़ी-
"भारत माँ की हथेली पर
मैं इक जीवनरेखा हूँ
मुझमे भी हैं प्राण तत्व,
किये गए सारे पापों का
मैं तो बस एक लेखा हूँ!
तुम मानों या न मानों
मैं नदी नहीं इंसान हूँ
सहन करूँ कुकर्म तुम्हारे
और भला अपमान क्यूँ?
मैं भी गाती सबको सुनाती
सदियों पुरानी अपनी गाथा
नदी नहीं कहते थे मुझको
तब मैं थी तुम सबकी माता
बढ़ता गया तुम्हारा लालच
बांध बनाकर बाँध दिया
खून की हर बूँद निकाली
मरणासन्न कर छोड़ दिया !
मचा हुआ कोहराम है
मुँह में छुरी और बगल में
बैठे हुए ज्यों राम है,
ड्रामे में आया है बंधु
नया नया इक मोड़
फूंक दिए भई देखो कैसे
बीस हजार करोड़ !!
निकाल न पाए फिर भी अपने
कुकर्मों का कूड़ा !
कर न पाए मेरी चिकित्सा
किया तनिक भी नहीं विचार
फलतः 'ब्लॉकेज' हुए हजार!
मेरी सारी छोटी बहनें
हुई आज हैं स्वर्गवासिनी
मैं भी हो जाऊंगी इक दिन
सरस्वती निजलोक गामिनी !
मेरा यही सवाल है
अब क्यों तुम्हें मलाल है
मानों या न मानों तुम
है मेरा अपना अस्तित्व,
भारत माँ की वृहत देह में
धमनियों का जाल है !
मुझसे प्राण प्रवाहित होकर
तुम तक श्वास है आता,
नदी नहीं हूँ महज एक मैं
सबकी हूँ भई माता !
चाहते हो गर अपनी रक्षा
करो चिकित्सा अपनी तुम
निज मस्तिष्क की कर लो बेटा
अब तो जरा सफाई तुम !!


स्वरचित
अल्पना नागर©


ज्ञातव्य है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नदियों को जीवित व्यक्ति की संज्ञा दी गई है।बहरहाल संपूर्ण देश में नदियों का जलस्तर तेजी के साथ घट रहा है। 'देवभूमि' उत्तराखंड जहाँ सैंकड़ों नदियां कलकल करती थी,आज लगभग 300 नदियां लुप्त हो चुकी हैं।रचना में मनुष्य द्वारा बेहिसाब जल दोहन,दूषित राजनीति,प्रदूषण आदि को इंगित किया गया है।प्रस्तुत रचना का कोई राजनितिक उद्देश्य नहीं है।

Saturday, 22 July 2017

आलेख- सफ़र

सफ़र

'सफ़र' शब्द सुनते ही हमारे दिमाग में उत्साह व रोमांच की एक लहर दौड़ जाती है।किन्हीं स्वास्थ्य कारणों के अपवाद को छोड़कर शायद ही कोई व्यक्ति होगा जिसे सफ़र में आनंद नहीं आता।अभी ग्रीष्मावकाश में भी सभी नें कहीं न कहीं भ्रमण का आनंद अवश्य लिया होगा।सफ़र या यात्रा दृष्टि से अन्तर्दृष्टि तक का सफ़र है।सफ़र के दौरान हम बहुत से नवीन अनुभवों से होकर गुजरते हैं,हमारी अन्तर्दृष्टि उन अनुभवों को आत्मसात कर संपूर्ण यात्रा का विश्लेषण करती है जिसकी अमिट छाप हमारे अंतर्मन पर जीवन पर्यन्त रहती है।
सफर या 'घुमक्कड़ी' का इतिहास बहुत प्राचीन है।प्राचीन भारतीय इतिहास के स्वर्णिम गौरव को संपूर्ण विश्व के कोने कोने तक पहुंचाने का कार्य विदेशी सैलानियों नें किया।प्राचीन इतिहास की तरफ अगर गौर करें तो विदेशी दूत मेगस्थनीज का जिक्र जरूर आता है,जिसने भारत में अपनी यात्रा अनुभव व निवास के आधार पर 'इंडिका' पुस्तक लिखी,जिससे मौर्य वंश के सुनहरे इतिहास की दुर्लभ जानकारी मिली।अगला जिक्र आता है चीनी यात्री फाह्यान का।अनुमानतः वह चीनी यात्री 400 ईस्वी के करीब भारत आया।फाह्यान द्वारा लिखी किताब से हमें गुप्त वंश,बौद्ध धर्म व तत्कालीन समय में भारत चीन संबंधों की जानकारी प्राप्त होती है।फाह्यान की तरह चीनी यात्री ह्वेनसांग नें भी अपनी दुर्लभ पुस्तक 'सी-यू-की' में भारत यात्रा तथा हर्षकालीन भारत के बारे में बहुत सी जानकारियां प्रदान की है।
अरब यात्री अलबरूनी द्वारा रचित 'किताब उल हिन्द' को दक्षिण एशिया के इतिहास का प्रमुख स्रोत माना जाता है।वह वर्षों तक भारत में रुका था।इसी तरह मोरक्को निवासी इब्नबतूता का जिक्र किये बिना सफर पर लेख अधूरा ही रहेगा।उसने अपने जीवनकाल में लगभग 75000 मील की यात्रा की।1333 ईस्वी में सुल्तान मुहम्मद तुगलक के दरबार में आया था।यह उसकी विद्वता का गुण ही था जिससे सुलतान नें प्रभावित होकर काज़ी पद पर नियुक्त किया।इब्नबतूता नें प्रसिद्ध यात्रा वृतांत 'रिहाला' की रचना की,जिससे तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप की बहुत ही रोचक जानकारियां हासिल होती हैं।
यह प्राचीन देशी विदेशी यात्रियों की आंतरिक जिज्ञासा ही थी जिसने संपूर्ण विश्व को अमूल्य खोज व जानकारियां प्रदान की तथा विश्व इतिहास के एक नए युग की शुरुआत की।आधुनिक अमेरिका की खोज के पीछे वास्कोडिगामा का जिज्ञासु घुमक्कड़ स्वभाव था।उसने भारत की भी लगभग तीन बार यात्रा की।यहाँ तक कि भारत के एक राज्य गोवा के एक बड़े शहर का नाम वास्कोडिगामा ही है।
हिंदी साहित्य के दिग्गज़ जिन्हें 'महापंडित' की उपाधि से नवाजा गया था,श्री राहुल सांकृत्यायन बहुत बड़े यात्री के रूप में याद किये जाते हैं।वे अनेक भाषाओं के जानकार थे।कहते हैं गतिशीलता उनके लिए वृत्ति नहीं,धर्म था।उनके द्वारा की गई देश विदेश की यात्राओं नें हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान दिया।यात्राएं व यात्रा वृतांत हमें वर्तमान को सुधारकर भविष्य को संवारने की प्रेरणा प्रदान करती हैं।
यात्रा का जिक्र आते ही बचपन की रेल यात्राओं की स्मृतियां हरी हो जाती हैं।यात्रा स्वयं में रोचक होती है किंतु अगर यात्रा रेल द्वारा हो तो सफ़र का आनंद दुगुना हो जाता है।रेल से दादी ,नानी के घर तक का सफ़र और रास्ते में अचार परांठे की महक का डिब्बे भर में फ़ैल जाना,खिड़की वाली सीट पर बैठकर रास्ते का मुआयना और एक एक कर पेड़ों,बिजली के खम्बों, गांव,स्टेशन और रास्ते का छूटते जाना,किसे याद नहीं होगा!यादों के शहर होते ही ऐसे हैं,हम जीवन भर पता नहीं कितनी यात्राएं करते हैं,फिर भी बरसों बाद भी अगर हम यादों के शहर की खुदाई करते हैं तो पुरानी सभ्यताओं की तरह क़ीमती वस्तुएं निकलकर आती हैं,वो पुरानी गालियां जिनमें कभी बचपन दौड़ा करता था, फिरकी,पीपल का पेड़,पुराना बाजार,मोहल्ले,चोर सिपाही की पर्चियां,भूतों की कहानियां,चाय की थड़ियां,बीसियों चाचा,ताऊ ,हिचकोले खाती साइकिल सब कुछ एकदम ताज़ा रहता है,बस हमें उन यादों पर जमी हल्की सी धूल झाड़नी होती है।
जीवन भी एक यात्रा ही है।हम सभी एक ही रेल से जुड़े भिन्न भिन्न डिब्बों में सवार यात्री हैं।स्टेशन आते हैं,ट्रेन रूकती है,यात्री उतरते व चढ़ते हैं लेकिन यात्राएं अनवरत जारी रहती हैं।
ऐसा भी होता है,कई बार सफ़र ही इतना रोचक व ऊर्जा से भरपूर होता है कि मंज़िल आ जाने पर सारी ख़ुशी काफ़ूर हो जाती है,लगता है जैसे सफ़र को अभी और जारी रहना था,क्यों इतनी जल्दी मंज़िल आ गई !जीवन में रिश्ते भी कुछ इसी तरह बुने होते हैं।प्रेम जब तक होता है तब तक सब कुछ नया और उत्साह से भरपूर नजर आता है किन्तु जैसे ही प्रेम यात्रा की परिणीति विवाह में होती है,वही प्रेम बंधन लगने लगता है।वर्तमान में मुक्त विवाह,लिव इन रिलेशनशिप ,तलाक के बढ़ते हुए मुद्दे इस तरह की प्रवृतियों के उदाहरण हैं।वर्तमान उपभोक्तावादी संस्कृति यात्रा का आनंद तो लेना चाहती है लेकिन मंज़िल पर पहुँच कर स्थिर नहीं होना चाहती।अगर विवाह को मंज़िल या ठहराव न समझकर एक खूबसूरत पड़ाव माना जाये तो यात्रा और भी सुखद हो सकती है।अक्सर हम विवाह के बाद शिथिल पड़ जाते हैं,एक उदासीनता हमारे जेहन पर हावी होने लगती है,वो पहले वाला 'चार्म' कहीं गायब होता नजर आता है।ये बात भी सत्य है कि स्थिरता मानव स्वभाव के विपरीत है अतः आवश्यक है कि विवाह के उपरान्त भी दोनों सहयात्री चलते रहें, एक दूसरे की भावनाओं को ध्यान में रखकर,स्व का विकास होने के लिए उचित 'स्पेस' देकर निरंतर चलते रहें ताकि शरीर और आत्मा बिना किसी अवरोध के विकसित होते रहें।
जीवन के अंतिम पड़ाव का सफ़र भी बहुत महत्वपूर्ण होता है।ये वो पड़ाव है जहाँ अधिकतर साथी एक एक कर हमारा साथ छोड़ते जाते हैं,तब सफ़र में हम नितांत अकेले पड़ जाते हैं किन्तु अगर इसे सकारात्मक तरीके से सोचा जाये तो उस अकेले सफ़र का भी अलग आनंद है,अब तक जीवन में हमें परिजनों व भीड़ से घिरे रहने की आदत थी,इन सब में खुद का साथ तो छूट ही जाता था,जीवन का अंतिम पड़ाव एक तरह का आशीर्वाद है स्वयं को जानने व स्वयं के साथ समय बिताने का।यह सफ़र दूसरों की सहानुभूति लेकर समय बर्बाद करने का नहीं है।जब कभी उम्र के इस पड़ाव पर खुद से दोस्ती होगी तो अपनी सोहबत का मर्म समझ आएगा।अकेला सफ़र कोई बीमारी या अवसाद का कारण नहीं अपितु आनंद की सुंदरतम स्थिति है,अध्यात्म की उच्चतम अवस्था।इसलिए अगर हम अंतिम सफ़र में आकर अकेले हो जाएं तो इसे खालीपन से बिल्कुल न भरें बल्कि खुद के साथ ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करें,पंछियों का कलरव सुनें,खुद को साथ लें और निकल पड़ें सुबह शाम की सैर पर,किताबों से दोस्ती करें तो अंतिम सफ़र कभी भी बोझिल समय नहीं लगेगा,जीवन का हर लम्हा एक यादगार उत्सव बन जायेगा।
यहाँ राहुल सांकृत्यायन जी की एक उक्ति याद आ रही है "यायावर बनना है तो चलते रहो.....चरैवेति -चरैवेति...।" क्योंकि जीवन बहुत विशाल है,एक जगह अगर ठहर गए तो दूसरी बहुत सी जगहें छूट जाएंगी।

स्वरचित
अल्पना नागर ©

Thursday, 20 July 2017

लघु कहानी- उद्देश्य


लघु कहानी - उद्देश्य

सरकारी स्कूल के पास एक लग्जरी कार आकार रुकी।कार में से सत्ताधारी दल के कुछ नामचीन नेतागण उतरे।पिछली अन्य विजिट के मुकाबले इस बार उनकी वाणी में मिश्री से भी अधिक मिठास थी।
"सर आपको तो ज्ञात होगा कि हमारी पार्टी जब से सत्ता में आयी है सिर्फ जनसेवा के लिए ही प्रतिबद्ध है।जनसेवा के इसी सिलसिले को बरक़रार रखने के लिए हम आज एक प्रस्ताव आपके पास लाये हैं,उम्मीद है आपको कोई आपत्ति नहीं होगी।"मुख्य नेता नें आत्मविश्वास के साथ कहा।
"जी बिल्कुल..कहिये।"प्रधानाचार्य नें कहा।
"स्वतंत्रता दिवस नजदीक है..दरअसल हम चाहते हैं कि इस बार गरीबी रेखा से नीचे परिवार वाले उन सभी बच्चों का जन्मदिन मनाया जाये जिनका जन्म स्वतंत्रता दिवस को हुआ।देखिये..हमारा मानना है कि सभी को खुश रहने का अधिकार है,तो गरीब परिवार जन्मदिन मनाने जैसे अवसर से क्यों वंचित रहें! हम आपके विद्यालय आएंगे और उन बच्चों के लिए केक पेस्ट्री मिठाई आदि का प्रबंध करेंगे।"
"वाह ये तो बहुत नेक सोचा आपने,आपके सेवाभाव और नवीन सोच को नमन।"प्रधानाचार्य नें खुश होते हुए कहा।
"जी,हम निःस्वार्थ भाव से काम करते हैं,दूसरे राजनितिक दलों की तुलना में हमारे दल के उद्देश्य विशुद्ध है,हम सिर्फ कर्म करने में यकीन करते हैं।"मुख्य नेता नें गर्व के साथ कहा।
प्रधानाचार्य के कहने पर सभी कक्षाओं से उन बच्चों का चयन किया गया जिनका जन्मदिन स्वतंत्रता दिवस को होता है।बच्चों को प्रधानाचार्य के कक्ष में बुलाया गया।
मुख्य नेता नें अपनापन दिखाते हुए सभी बच्चों से हाथ मिलाया और आग्रह करते हुए कहा कि इस बार अपने जन्मदिन पर अपने माता पिता को जरूर साथ लेकर आना।
कक्ष में उपस्थित सभी कार्मिकों के आश्चर्य का ठिकाना न था।
"ठीक है,अब चलते हैं..आज्ञा दीजिये।"सेनेटाइजर से हाथ साफ करते हुए नेता नें कहा।
विद्यालय के मुख्य दरवाजे तक गाड़ी पहुंची ही थी कि आठवीं कक्षा के एक विद्यार्थी नें हाथ से इशारा कर रोकने का प्रयास किया।
"ये क्या तरीका है.."।कड़ककर नेता नें पूछा।
"सर वैरी सॉरी लेकिन जरुरी बात करनी थी।मैंने देखा आप इतने बड़े दिल के लोग हैं तो सोचा मेरी भी मदद करेंगे।"लड़के नें कहा।
"कहो.."
"सर मेरे पापा बहुत पहले ही गुजर गए थे,मैं लगभग दो साल का था..मेरी माँ घरों में झाड़ू पोंछा लगाकर मुझे और मेरी तीन छोटी बहनों को किसी तरह पढ़ा लिखा रही है।मैं हर बार कक्षा में प्रथम आता हूँ लेकिन अब मेरी माँ की तबियत बहुत ख़राब रहती है,इसलिए मुझे दुकान पर मजदूरी करने जाना होगा।अगर आप की कृपा हो तो मैं और मेरी छोटी बहनें आगे भी पढ़ लिख सकती हैं।"
"हां..हां.. देखते हैं ..देखते हैं..अब रास्ता छोड़ो अगले प्रोग्राम के लिए देर हो रही है।" कहकर नेता जी की गाड़ी आगे बढ़ गई।"
"ये सियासत भी पता नहीं क्या क्या दिन दिखाएगी..बात अगर मजदूरों के वोट की नहीं होती तो झांकता भी नहीं ऐसे सड़कछाप बच्चों की तरफ..अब इनका जन्मदिन मनाकर मीडिया में किसी तरह बात जाए तो हमारा उद्देश्य सफल हो..।"रास्ते भर नेताजी बड़बड़ाते रहे।

स्वरचित कॉपीराइट
अल्पना नागर

Tuesday, 18 July 2017

डायरी -कविता

डायरी

बिखरे पड़े शब्द
और चाय की प्याली सी
उड़ेली गई भावनाएं,
बरसों तक महकती रही
उसकी रूह के भीतर तक,
वो संभालकर रखती गई
तारीख़ें और शब्द
एक एक कर
तह करके
किसी समझदार गृहिणी की तरह,
तुम भी,कहाँ छुपा पाए
स्याह गहरे राज़!
देर रात जब नींद के शहर में
होता था जमाना,
तुम हौले से खटखटाते थे
उसका द्वार,
फ़िर होती थी लंबी गुफ़्तगू
कभी तुम्हारे दर्द से भीग जाते थे
उसके पन्ने,
और फिर एक रोज़..
छोड़ आये तुम उसे
अँधेरे किसी कोने में
नितांत अकेले!
तुम्हें आगे बढ़ना था
तुम आगे बढ़े,
डिजिटल स्क्रीन पर दौड़ती हैं अब
तुम्हारी उंगलियां,
लेकिन सच बताना
क्या स्क्रीन का हर अक्षर
आँखों में उतर पाता है?
क्या स्क्रीन के पन्नों की आवाज़
कानों में फड़फड़ाती है?
क्या उसके पन्नों की महक
तुम्हारे फेंफडों को
आत्मीय गंध से भरती है?
नहीं न!
वो जानती है
स्क्रीन पर शब्द नाचते हैं
तुम्हारी आँखों के सामने,
एक पंक्ति से दूसरी तक आते आते
शब्द फिसल कर गिरने लगते हैं
दिमाग की नसें करने लगती हैं
बगावत !
डेस्क पर लगी
कॉफ़ी मग की कतार
बयां करती है तुम्हारी बेचैनी को,
लेकिन,
डिजिटल स्क्रीन और उसका
क्या मुकाबला!!
कहाँ वो एकदम साधारण,
और कहाँ वो तेज तर्रार
डिजिटल युग की अल्ट्रा मॉडर्न !!
लेकिन फिर भी
वो इंतज़ार करती है,
उसे सरोकार है तुम्हारी
तमाम खुशियों और उदासियों से
डायरी है वो
सब जानती है...

अल्पना नागर